सम्पूर्ण सकल जैन समाज में युग दृष्टा ब्रम्हांड के देवता संत शिरोमणि आचार्य प्रवर 108 श्री विद्यासागर जी महाराज के अचानक सम्यक ब्रह्मलीन होने से सारा समाज स्तब्ध।
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आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के ब्रह्मलीन होने से हुआ एक युग का अंत हुआ। चंद्रगिरी- चंद्रगिरी तीर्थ डोंगरगढ में विराजित संपूर्ण जैन समाज के महानायक आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के अचानक आज उत्तम सत्य धर्म के रोज सम्यक ब्रह्मलीन समाधि होने से सम्पूर्ण जैन समुदाय में शोक की लहर छा गई ।
राजस्थान समग्र जैन युवा परिषद् के संरक्षक अशोक बांठिया और अध्यक्ष जिनेन्द्र जैन ने शोक व्यक्त करते हुए बताया कि आचार्य श्री श्रमण संस्कृति के महामहिम संत थे,उनकी समाधि से श्रमण संस्कृति का सूर्य अस्त हो गया। उन्होंने अपनी साधना और चर्या से श्रमण संस्कृति को सदैव गौरवान्वित किया है। उन्होंने इंडिया नहीं भारत बोलो का नारा बुलंद कर संपूर्ण जगत में जैन धर्म को नई पहचान दी थी।उनकी समाधि से सम्पूर्ण राष्ट्र सहित पूरे विश्व में शोक की लहर व्याप्त है सारे विश्व में उनके अनुयाई हैं। सत्य,अहिंसा और अपरिग्रह से ओतप्रोत मुनि राज धरती के देवता थे, आचार्य श्री विद्यासागर जी महा मुनिराज का समाधिष्ट होना एक युग का अंत है।संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज की समता पूर्वक समाधी हो गयी पूज्य आचार्य श्री के सम्पूर्ण जीवन को वंदन नमन –वर्तमान के वर्धमान , उच्चतम संयम जीवन पालन कर समाधी लीन हुवे दिगम्बर जैनाचार्य पूज्य आचार्य 108 श्री विद्यासागर जी महाराज के देवलोक गमन के समाचार से न केवल सकल जैन समाज बल्कि सम्पूर्ण देश शोकाकुल है । आचार्य श्री नें त्याग तपस्या संयम के जो उच्चतम आयाम स्थापित किये उन्ही की बजह से आप वर्तमान के वर्धमान कहलाये आप के देवलोक गमन से पृथ्वी लोक मैं अवश्य रिक्तता पैदा हुई है, तो देवलोक में एक नया सितारा स्थापित हो गया है।
आचार्य गुरूदेव की संल्लेखना पूर्ण समाधी एक साधक की महत्वपूर्ण कड़ी है। आज संपूर्ण भारत में शोक की लहर एवं दुःख व्याप्त है। पूज्य गुरूदेव के करोड़ों भक्तो ने आज सम्पूर्ण भारत में अपने व्यसाय वंद रखकर अपने गुरु के प्रति विनयांजलि अर्पित की है, आचार्य गुरूदेव का सर्वप्रथम आगमन 2002 में हुआ एवं 2008, तथा 2014 में शीतलधाम का चातुर्मास संपन्न हुआ
एवं विदिशा से 4 युवकों ने मुनि दीक्षा ली आचार्य गुरूदेव से जैन ही नहीं जैनेतर समाज भी बहूत प्रभावित थी आचार्य गुरुदेव एक मात्र ऐसे दिगंबर जैनाचार्य है जिन्होंने लगभग 500 से अधिक मुनि एवं आर्यिकाओं को दीक्षा प्रदान की है एवं हजारों की संख्या में वृति श्रावक एवंश्राविकाऐं तथा लाखों भक्त है।
वर्तमान में आप भगवान महावीर के लघुनंदन कहलाते है, आपके द्वारा जैन तीर्थ क्षेत्रों के विकास के साथ हस्तकर्धा के माध्यम से ग्रामीण एवं समाज से वंचित कारागार के कैदियों को पाप से मुक्त कराकर उनको रोजगार उपलव्ध करा रहे है आचार्य गुरुदेव ने भारतीय शिक्षा नीति को प्रोत्साहित करते हुये राष्ट्रीय भाषा एवं राष्ट्र की एवं न्याय पालिका की कार्यवाही मात्र भाषा हिंदी में करने का अभियान, जीव दया के प्रति भावना रखते हुये सर्व सुविधा युक्त शतक से ऊपर गौ शालाओं की प्रेरणा एवं बेटी पड़ाओ के साथ उनके अंदर ज्ञान के साथ चारित्र निर्माण एवं संस्कार शिक्षा के साथ प्रतिभा स्थली का निर्माण कर दस हजार से ऊपर बालिकाओं को शिक्षा दी जा रही है।
आचार्य गुरुदेव चलते फिरते तीर्थ थे बह जंहा पर विराजमान हो जाते थे बंही पर जंगल में मंगल हो जाया करता था उनके इस उपकार को मानव जाति ही नहीं वल्कि पशु पक्षी भी शांति महसूस करते थे वह भगवान महावीर की चर्या के प्रतीक भगवान आदिनाथ बड़े बाबा और आचार्य गुरुदेव छोटे बाबा के नाम से प्रसिद्ध थे।आचार्य श्री की विगत रात्रि की ब्रहम मूहर्त में 2:35 बजे चंद्रागिरी तीर्थ डोंगरगढ़ में समाधि हो गई है । आपका जन्म १० अक्टूबर १९४६ को विद्याधर के रूप में कर्नाटक के बेलगाँव जिले के सदलगा में शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। उनके पिता श्री मल्लप्पा थे जो बाद में मुनि मल्लिसागर बने। उनकी माता श्रीमंती थी जो बाद में आर्यिका समयमति बनी।विद्यासागर जी को ३० जून १९६८ में अजमेर में २२ वर्ष की आयु में आचार्य ज्ञानसागर ने दीक्षा दी जो आचार्य शांतिसागर शिष्य थे।
आचार्य विद्यासागर जी को २२ नवम्बर १९७२ में ज्ञानसागर जी द्वारा आचार्य पद दिया गया था, केवल विद्यासागर जी के बड़े भाई ग्रहस्थ है। उनके अलावा सभी घर के लोग संन्यास ले चुके है।उनके भाई अनंतनाथ और शांतिनाथ ने आचार्य विद्यासागर जी से दीक्षा ग्रहण की और मुनि योगसागर जी और मुनि समयसागर जी कहलाये। आचार्य विद्यासागर जी संस्कृत, प्राकृत सहित विभिन्न आधुनिक भाषाओं हिन्दी, मराठी और कन्नड़ में विशेषज्ञ स्तर का ज्ञान रखते हैं। उन्होंने हिन्दी और संस्कृत के विशाल मात्रा में रचनाएँ की हैं। सौ से अधिक शोधार्थियों ने उनके कार्य का मास्टर्स और डॉक्ट्रेट के लिए अध्ययन किया है।
उनके कार्य में निरंजना शतक, भावना शतक, परीषह जाया शतक, सुनीति शतक और शरमाना शतक शामिल हैं। उन्होंने काव्य मूक माटी की भी रचना की है।विभिन्न संस्थानों में यह स्नातकोत्तर के हिन्दी पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाता है।आचार्य विद्यासागर जी कई धार्मिक कार्यों में प्रेरणास्रोत रहे हैं। आचार्य विद्यासागर जी के शिष्य मुनि क्षमासागर जी ने उन पर आत्मान्वेषी नामक जीवनी लिखी है। इस पुस्तक का अंग्रेज़ी अनुवाद भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित हो चुका है।मुनि प्रणम्यसागर जी ने उनके जीवन पर अनासक्त महायोगी नामक काव्य की रचना की है। थोड़ा सा जानिए आचार्य श्री को कोई बैंक खाता नही कोई ट्रस्ट नही, कोई जेब नही , कोई मोह माया नही, अरबो रुपये जिनके ऊपर निछावर होते है उन गुरुदेव के कभी धन को स्पर्श नही किया(1) आजीवन चीनी का त्याग (2)आजीवन नमक का त्याग (3)आजीवन चटाई का त्याग (4) आजीवन हरी सब्जी का त्याग, फल का त्याग, अंग्रेजी औषधि का त्याग,सीमित ग्रास भोजन, सीमित अंजुली जल, 24 घण्टे में एक बार 365 दिन (5)आजीवन दही का त्याग (6) सूखे मेवा (dry fruits)का त्याग
(7)आजीवन तेल का त्याग, (8)सभी प्रकार के भौतिक साधनो का त्याग (9) थूकने का त्याग (10) एक करवट में शयन बिना चादर, गद्दे, तकिए के सिर्फ तखत पर किसी भी मौसम में। (11)पुरे भारत में सबसे ज्यादा दीक्षा देने वाले (12) एक ऐसे संत जो सभी धर्मो में पूजनीय (13) पुरे भारत में एक ऐसे आचार्य जिनका लगभग पूरा परिवार ही संयम के साथ मोक्षमार्ग पर चल रहा है (14) शहर से दूर खुले मैदानों में नदी के किनारो पर या पहाड़ो पर अपनी साधना करना (15) अनियत विहारी यानि बिना बताये विहार करना (16)प्रचार प्रसार से दूर- मुनि दीक्षाएं, पीछी परिवर्तन इसका उदाहरण, (17)आचार्य देशभूषण जी महराज जब ब्रह्मचारी व्रत से लिए स्वीकृति नहीं मिली तो गुरुवर ने व्रत के लिए 3 दिवस निर्जला उपवास किआ और स्वीकृति लेकर माने (18)ब्रह्मचारी अवस्था में भी परिवार जनो से चर्चा करने अपने गुरु से स्वीकृति लेते थे और परिजनों को पहले अपने गुरु के पास स्वीकृति लेने भेजते थे । (19)आचार्य भगवंत जो न केवल मानव समाज के उत्थान के लिए इतने दूर की सोचते है वरन मूक प्राणियों के लिए भी उनके करुण ह्रदय में उतना ही स्थान है । (20)शरीर का तेज ऐसा जिसके आगे सूरज का तेज भी फिका और कान्ति में चाँद भी फीका है (21) ऐसे हम सबके भगवन चलते फिरते साक्षात् तीर्थंकर सम संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्या सागर जी के चरणों में शत शत नमन नमन नमन (22) हम धन्य है जो ऐसे महान गुरुवर का सनिध्य हमे प्राप्त हो रहा है
प्रधानमंत्री हो या राष्ट्रपति सभी के पद से अप्रभावित साधना में रत गुरुदेव हजारो गाय की रक्षा , गौशाला समाज ने बनाई। हजारो बालिकाओ को संस्कारित आधुनिक स्कूल इतना कठिन जीवन के बाद भी मुख मुद्रा स्वर्ग के देव सी…. नमोस्तु गुरूदेव जी युग दृष्टा ब्रहमांड के देवता संत शिरोमणि आचार्य प्रवर श्री विद्यासागर जी महामुनिराज आज दिनांक 17 फरवरी शनिवार तदनुसार माघ शुक्ल अष्टमी पर्वराज के अंतर्गत उत्तम सत्य धर्म के दिन रात्रि में2:35 बजे हुए ब्रह्म में लीन।हम सबके प्राण दाता राष्ट्रहित चिंतक परम पूज्य गुरुदेव ने विधिवत सल्लेखना बुद्धिपूर्वक धारण की। पूर्ण जागृतावस्था में उन्होंने आचार्य पद का त्याग करते हुए 3 दिन के उपवास गृहण करते हुए आहार एवं संघ का प्रत्याख्यान कर दिया था एवं प्रत्याख्यान व प्रायश्चित देना बंद कर दिया था और अखंड मौन धारण कर लिया था। 6 फरवरी मंगलवार को दोपहर शौच से लौटने के उपरांत साथ के मुनिराजों को अलग भेजकर निर्यापक श्रमण मुनिश्री योग सागर जी से चर्चा करते हुए संघ संबंधी कार्यों से निवृत्ति ले ली और उसी दिन आचार्य पद का त्याग कर दिया था। उन्होंने आचार्य पद के योग्य प्रथम मुनि शिष्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री समयसागर जी महाराज को योग्य समझा और तभी उन्हें आचार्य पद दिया जावे ऐसी घोषणा कर दी थी जिसकी विधिवत जानकारी कल दी जाएगी।
परमपूज्य गुरूदेव ने पूरी जागृत अवस्था में अंत समय तक प्रभु स्मरण के साथ उपस्थित निर्यापक श्रमण मुनि श्री योगसागर जी निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी निर्यापक श्रमण मुनि श्री प्रसादसागर जी मुनिश्री चन्द्रप्रभसागर जी मुनिश्रीपूज्यसागर जी मुनि श्री निरामयसागर जी मुनिश्री निस्सीमसागर जी ऐ.निश्चयसागर ऐ श्री धैर्यसागर जी एवं बा ब्र. विनयभैया की उपस्थिति और संबोधन के चलते नश्वर देह का चन्द्रगिरि तीर्थ पर आज रात्रि २-३५ पर त्याग कर दिया । गुरुवारश्री जी का डोला चंद्रगिरी तीर्थ डोंगरगढ में दोपहर 1 बजे से निकाला गया ,एवम् चन्द्रगिरि तीर्थ पर ही पंचतत्व में विलीन किया गया ।
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