झूठ बेवजह दलील देता है,सच खुद अपना वकील होता है।
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एक लोकोक्ति ‘सच्चे का बोलबाला और झूठे का मुँह काला’ उन लोगों पर सटीक चरितार्थ होती है कि जो बिना विचार किए, आगे-पीछे की सोचे बिना सत्य को जानते हुए शंख बन पराई फूंक से बजाने का अधम प्रयास करते हैं। परिवार में किसी भी प्रकार का विवाद हो तो कोई बात नहीं वह व्यक्ति किसी भी प्रकार से सुलझाए, परन्तु जहाँ समाज, धर्म की बात हो और दूसरों की शह पर या अपने जमीर को चन्द रुपयों में बेचकर असत्य का साथ देते हुए व्यक्ति धर्म राह का रोड़ा बनता है वह कभी भी विजयी नहीं हो सकता है। कहा भी है कि ‘सदा कागज की नाव नहीं बहती’ अर्थात् छल सर्वदा फलीभूत नहीं होता है।असत्य का बीज कभी नहीं पनपता है। क्योंकि वह बिना आधार का होता है और आधारहीन बात का कहीं भी सत्कार नहीं होता चाहे वह समाज, परिवार अथवा न्यायालय में हो। सत्य मार्ग का अनुयायी और उस पर अपने कदम दृढ़ रखने वाला कितने ही दुष्कर मागों के कंटकों को सहता हुआ अपने आराध्य के शुभाशीर्वाद से धैर्यता, साहस और अपने निष्काम परिश्रम से अपने कार्यों में सफल होकर यश की प्राप्ति करता है।देव-गुरु-धर्म के उपासक को कभी भी निराशा का सामना नहीं करना पड़ता है, क्योंकि उसकी समर्पणता, निष्ठा और लगन उसके दुस्सह मार्ग की सभी बाधाएँ दूर कर देती है। हाँ, क्षणिक अल्पबुद्धि आत्माएँ झूठ का दामन थाम कर उसे सत्यमार्ग से भटकाने का, उसके यश को धूमिल करने का प्रयास अवश्य करती है परन्तु वे अधिक समय तक नहीं कर पाती।
कहा भी है कि झूठ के पाँव नहीं होते । संसार में सत्य की सदा विजय होती आई है, चाहे वह देर से प्राप्त हो परन्तु सत्यमेव जयते सुवाक्य योंही निर्मित नहीं हुआ है।मतिहीन व्यक्ति धन से, बल से और ऐश्वर्य से समृद्ध भले ही हो परन्तु अपने साधनों से सत्यमार्गी को पथ-भ्रमित नहीं कर सकता । अनर्गल आरोप-प्रत्यारोप लगाकर किसी भी व्यक्ति की छवि बिगाड़ने का कार्य संसार में केवल मतिमन्द, छोटी सोच के व्यक्ति ईर्ष्यावश समाज में अपनी छवि उज्ज्वल करने के प्रयास में करते हैं और इतिहास साक्षी है कि ऐसे व्यक्तियों पर कुदरत की लाठी जब पड़ती है तो वह बेआवाज पड़ती है और उस लाठी की गूँज से अपनी और परिवार की कीर्ति को कलंकित करते हैं।समाज, परिवार की कोई घटना या बात हो तो बुद्धिमान पहले उसकी तह तक जाता है और फिर धर्मोचित मार्ग पर चलते हुए समाधान या निर्णय करता है। क्योंकि उसे उसके सम्मान या अपमान की चिन्ता नहीं बल्कि समाज और परिवार की चिन्ता रहती है कि यदि मैंने कोई भी अनुचित कदम उठाया या निर्णय लिया तो उसका परिणाम पूरे समाज और परिवार को भुगतना पड़ेगा।जो स्वयं संसार के विघ्न का नाश करने वाले हों और उनके कार्य में विघ्न उपस्थित करने की बात मतिहीन प्राणी ही सोच सकता है। ऐसी ही घटना वर्तमान में श्री भाण्डवपुर महातीर्थ में आयोजित तत्त्वत्रयी प्रतिष्ठोत्सव में देखने को मिली। विनाशकाल आता है तो विपरीत बुद्धि हो जाती है और व्यक्ति बिना विचार किए मिथ्यारोप लगाकर देव-गुरु-धर्म को हानि पहुँचाने का कार्य कर बैठता है। ऐसे ही मतिमन्द श्री भैरू जैन उर्फ चम्पालालजी मानमलजी ओबाणी पोषाणा वाले ने तत्त्वत्रयी प्रतिष्ठोत्सव के विरूद्ध जालोर न्यायालय में याचिका दायर कर तीर्थ, ट्रस्ट और गुरुओं के विरूद्ध षड्यन्त्र करने का कुछ स्वार्थी, पदलोलुप व्यक्तियों के बहकावे में आकर कुप्रयास किया। परिणाम स्वरूप न्यायालय में मुँह की खानी पड़ी और धर्म की विजय हुई। दिनाकं 6 मार्च 2024 को जिला न्यायाधीश जालोर ने प्रस्तुत वाद को खारिज कर मामला समाप्त कर दिया।’भाण्डवपुर राजे सकल समाजे, वीर बिराजे अति बंका’ की रचना पूज्य दादा गुरुदेवश्री ने ऐसे ही नहीं की।

यहाँ के वीर प्रभु को आस-पास के ग्रामों की 36 कौम के अतिरिक्त यहाँ पर आने वाले देश के लाखों श्रद्धालु मानते और जानते हैं। वीर प्रभु के आशीर्वाद की किरणें यत्र-तत्र और सर्वत्र विद्यमान रहती है; जिससे श्रद्धालु प्रतिपल लाभान्वित होते रहते हैं। श्रद्धाहीन व्यक्ति उन किरणों का साक्षात्कार नहीं कर सकता क्योंकि सत्य समक्ष होता है तो आँखें चुधिया जाती हैं। झूठ की नाव सच के समन्दर में कभी भी चल नहीं सकती है, वह तो स्वयं भी डूबती है और बैठने वाले को भी डूबा देती है।इससे पूर्व भी श्री जीतमल उर्फ जयन्तीलालजी पुत्र सरदारमलजी गोवाणी-चौराऊ निवासी द्वारा सेशन न्यायालय, उच्च न्यायालय एवं सुप्रीम न्यायालय में चल रहा वाद भी वीर प्रभु की असीम अनुकम्पा से दिनांक 23 फरवरी 2024 को खारिज हो गया था। परन्तु मूर्ख तो जिस शाख पर बैठते हैं उसी को काटने का प्रयास करते हैं और उन्माद में भूल जाते हैं कि यह धर्म की शाख है और कितने ही प्रयासों के उपरान्त भी नहीं कट पाएगी। धर्म का प्याला पीने वाला ही मतवाला होता है उसे हाला समझ पीने वाला दुर्गति में जाता है और संसार में अपयश कमाता है।आँखों से अन्धा व्यक्ति फिर भी कार्य करने में सफल हो सकता है परन्तु अक्ल के अन्धों को कितना भी समझाने का प्रयास कीजिये वह लकीर के फकीर बन अपनी एवं परिवार की छवि धूमिल करने का पुण्य अर्जित करने में अपनी आत्म सन्तुष्टि मानते हैं। समाज ऐसे व्यक्तियों से सावधान एवं सुरक्षित रहे। इसके लिए सकल जैन समाज को एक साथ एकस्वर में एक कठोर निर्णय करते हुए ऐसे धर्म एवं समाज विरोधी व्यक्तियों के विरूद्ध सामाजिक कार्यवाही करते हुए इनका सामाजिक बहिष्कार करे, जिससे ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं हो सके ।सच्चाई कड़वी दवा, काटे जड़ से रोग। ‘पारदर्शी’ कबीर से, डरते ढोंगी लोग ।। उपरोक्त पंक्तियों को सार्थक करते हुए मैंने अपनी लेखनी में कोई भी शब्द किसी द्वेष या किसी को नीचा दिखाने के प्रयास से नहीं कागज पर उकेरा है और न ही किसी दबाव या प्रलोभन से। ‘देखा वही लिखा’ है इन घटनाओं के सारे साक्ष्य या अन्य किसी विषय पर जानकारी प्राप्त करना हो तो वह व्यक्तिगतरूप से मुझसे कर सकता है। वह भी अपने सच्चे साक्ष्य के साथ, व्यर्थ के प्रपंच करना हो तो वह अपना और मेरा समय नष्ट नहीं करें।
सथ का साथ देना जिनशासन रसिक के लिए आवश्यक है और मैंने इसी का ध्यान रखते हुए अपनी लेखनी को इस विषय पर गतिमान किया है। यह लेखनी किसी को शीतलता का अहसास कराएगी तो किसी को ऊष्णता का। जैसा चश्मा आँख पर होगा वैसा ही रंग दृष्टिगत होगा। पिछले काफी समय से इन घटनाओं को लेकर भ्रमित व्यक्तियों के लिए यह पत्र आपके भ्रम को हटाने में सहायक होगा। वीर प्रभु एवं दादा गुरुदेवश्री सभी को सद्बुद्धि प्रदान करे और जिनशासन की गरिमा, गुरु गच्छ की कीर्ति में सभी समर्पित भाव रखते हुए अपना आत्मकल्याण करने का प्रयास करेंगे तभी हम वीर के सिपाही कहलाने के हकदार होंगे। जिनाज्ञा के विरूद्ध कुछ लिखने में आया हो तो क्षम्य करावें ।(1116)
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