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एक्ट फॉर डिस्लेक्सिया अभियान के अंतर्गत राष्‍ट्रपति भवन और देश के अन्‍य प्रमुख भवनों और स्‍मारकों को लाल रंग से रोशन किया गया।

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नई दिल्ली-मस्तिष्क द्वारा लिखित भाषा को संसाधित करने और सीखने में बाधा उत्‍पन्‍न करने वाली नि:शक्‍तता-डिस्लेक्सिया के बारे में देशभर में जागरूकता बढाने के अभियान एक्ट फॉर डिस्लेक्सिया के अंतर्गत राष्ट्रपति भवन, संसद भवन, उत्तर और दक्षिण ब्लॉक और इंडिया गेट सहित दिल्ली सरकार के उच्चतम कार्यालयों और प्रमुख स्मारकों को लाल रंग से रोशन किया गया है।यह अभियान पटना, रांची, जयपुर, कोहिमा, शिमला और मुंबई सहित प्रमुख शहरों में चलाया गया। इसमें डिस्लेक्सिया और सीखने की अन्य अक्षमताओं को विवेकपूर्ण ढंग से बढावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।इस पहल का उद्देश्य पढने-लिखने और सीखने में कठिनाई संबंधी विकार के बारे में जागरूकता बढाना है जिससे साढे तीन करोड़ विद्यार्थियों सहित भारत की 20 प्रतिशत आबादी के प्रभावित होने का अनुमान है। यूनेस्को के सहयोग से महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन फॉर पीस एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट (एमजीआईईपी) और चेंजइंक फाउंडेशन द्वारा इसका आयोजन किया जा रहा है।इस अवसर पर समावेशिता बढाने के संदेश के साथ दिव्‍यांगजन सशक्तिकरण विभाग के सचिव श्री राजेश अग्रवाल ने भारत में संयुक्त राष्ट्र के स्‍थानिक समन्वयक श्री शोम्बी शार्प के साथ वॉक फॉर डिस्लेक्सिया’ को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। डिस्लेक्सिया के बारे में जागरूकता फैलाने और समाधान की सामूहिक कार्रवाई के हिस्‍से के तौर पर यह यात्रा आयोजित की गई जिसमें सीखने की अक्षमता वाले व्यक्तियों के लिए समान अवसर और उन्‍हें सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया गया। यूनेस्को के सहयोग से महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन फॉर पीस एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट (एमजीआईईपी), चेंजइंक फाउंडेशन तथा ऑर्किड्स फाउंडेशन और सोच फाउंडेशन के सह-सहयोग से आयोजित वॉक फॉर डिस्‍लेक्सिया में 300 से अधिक लोगों ने भाग लिया।  यह यात्रा 27 अक्टूबर की सुबह विजय चौक से इंडिया गेट तक आयोजित की गई।

अभियान के प्रति उत्साह व्यक्त करते हुए, श्री राजेश अग्रवाल ने कहा कि एक्ट फॉर डिस्लेक्सिया सुविचारित अभियान है जो प्रगति के लिए आवश्यक है। उन्‍होंने कहा कि पिछले वर्ष की अपेक्षा इस अभियान में देश की वृद्धि को देखकर खुश हूं, जिसमें 1,बार अभियान में लोगों की भागीदारी काफी बढी है। इस बार सोलह सौ से अधिक पदयात्राएं आयोजित की गईं जिनमें 4 लाख से अधिक लोगों ने भाग लिया। श्री अग्रवाल ने कहा कि उन्‍हें पर्पल फ्लेम चैटबॉट आरंभ करने पर प्रसन्‍नता हो रही है जो स्कूलों, शिक्षकों, डॉक्टरों और संबंधित अन्य लोगों को सीखने के विकास से ग्रस्‍त लोगों की जांच और उसके निदान में सहायक होगा। इस प्रकार की नि:शक्‍तता से प्रभावित लोगों की मदद और विकास के समान अवसरों तक पहुंच सुनिश्चित कराने में लगे समान सोच वाले संगठनों के साथ मिलकर सरकार काम करने को तत्‍पर है।

इस अवसर पर अपना दृष्टिकोण व्‍यक्‍त करते हुए श्री शोम्बी शार्प ने कहा कि भारत में संयुक्त राष्ट्र की तरफ से और संयुक्त राष्ट्र महासचिव का प्रतिनिधित्व करते हुए वे चेंजइंक, एमजीआईईपी और अन्य संगठनों के साथ मिलकर यूनेस्को समर्थित डिस्लेक्सिया जागरूकता माह और एक्ट फॉर डिस्लेक्सिया अभियान का समर्थन करते हैं जो उनके लिए सम्मान की बात है। उन्‍होंने कहा कि सीखने की नि:शक्‍तता के अधिकारों के महत्व पर जागरूकता बढ़ाने के लिए कर्तव्य पथ से इंडिया गेट तक निकाली गई पदयात्रा में हम शामिल हुए। उन्‍होंने कहा कि यह असाधारण बात है कि समान अवसर देने पर सीखने की नि:शक्‍तता वाले व्यक्तियों ने बड़ी सफलताएं अर्जित की हैं और वे आविष्कारक, नोबेल पुरस्कार विजेता और उद्यमी तक बने हैं। उन्‍होंने कहा कि हमें सामाजिक विकास के लिए ऐसी प्रतिभाओं की क्षमता को सामने लाने की आवश्यकता है। यदि भारत इसे हासिल करता है तो वह वैश्विक स्तर पर सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने में योगदान देगा।डिस्लेक्सिया के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए इस वर्ष राष्ट्रव्यापी अभियान का काफी विस्तार हुआ है, देश भर में 1,राज्यों की राजधानियों, जिलों, प्रखंडों, गांवों और स्कूलों के स्‍तर पर सोलह सौ से अधिक पदयात्राएँ और कार्यक्रम आयोजित किए गए जिनमें 4 लाख से अधिक लोग शामिल हुए। उन्‍होंने सामूहिक तौर पर 2 अरब से अधिक ऐसे उपाय किए जिससे एक्ट फॉर डिस्लेक्सिया के प्रति जागरूकता बढ़ाई जा सके। डिस्‍लेक्सिया के प्रति जागरूकता बढाने के लिए राज्य शिक्षा विभागों, अभिभावक समूहों और शैक्षणिक संस्थानों द्वारा 150 से अधिक संगठनों के सहयोग से पदयात्राएं निकाली गई जो सरकारी विभागों, अभिभावकों, शिक्षा प्रदाताओं, नागरिक समाज संगठनों और निजी क्षेत्रों के सामूहिक प्रयास को दर्शाता है।

डिस्लेक्सिया जागरूकता क्यों मायने रखती है

डिस्लेक्सिया को अक्सर धीमे सीखने वाले लक्षण संबंधी गलत धारणा बनी हुई है। हालाँकि इससे प्रभावित व्‍यक्तियों को समझने, बोलने, पढ़ने, लिखने, वर्तनी या गणितीय गणना में कठिनाई होती है, फिर भी वे तार्किक, समस्या-समाधान और नवाचार सहित उच्च-स्तरीय सोच से युक्‍त होते हैं। गौरतलब है कि स्व-अर्जित धन वाले करोड़पतियों में से 40 प्रतिशत डिस्लेक्सिया से पीडित हैं। अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे महान आविष्‍कारण भी डिस्लेक्सिया से जूझ रहे थे।डिस्लेक्सिया सहित सीखने की नि:शक्तता को आधिकारिक तौर पर दिव्यागं व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम 2016 के तहत मान्यता दी गई है। इससे उन्‍हें  शिक्षा, रोजगार और जीवन के अन्य क्षेत्रों में अनिवार्य रूप से समान अवसर मिलता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी इसी नीति को बल देता है जिसमें प्रारंभिक से उच्च शिक्षा तक समावेशी शिक्षा पर जोर दिया गया है। नई शिक्षा नीति के प्रावधानों में ऐसी नि:शक्‍तता की शीघ्र पहचान, उन्‍हें शिक्षित करने वाले शिक्षकों के क्षमता निर्माण और पीडितों को आवश्यक सहायता तथा आवास प्रदान करने पर ध्‍यान केंद्रित किया गया है।

 

 

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