श्रद्धा के साथ पितृरो को कराया गया भोजन श्राद्ध कहलाता है
|
😊 Please Share This News 😊
|

भीनमाल ।एक ऋषि परम्परा के अनुसार श्राद्ध 10 सितम्बर से शुरू होकर 25 सितम्बर तक चलेगा । श्राद्ध का स्वरूप पृथ्वी चन्द्रयोदय में लिखा हैं कि जो भोजन अपने को रूचता है, वह प्रेत और पितरों के निमित्त जब श्रद्धा से दिया जाय तब उसे श्राद्ध कहते हैं। मरीचि ने कहा है कि -श्रद्धया दीयते यत्ऱ तच्छ्राद्धं परिकीर्तितम्।। ब्रह्मकर्म प्रकाशक शास्त्री प्रवीण त्रिवेदी ने बताया कि श्राद्ध मूलतः उन के लिए किया जाता है जो पितृ रूप में हैं। इसी संदर्भ में यह भी निरूपित किया गया हैं कि नश्वर स्थूल शरीर नष्ट होने पर भी उस योनि द्वारा संपादित किया हुआ कर्म नष्ट नहीं होता। हमारे सूक्ष्म शरीर में कर्म का प्रतिबिम्ब रह जाता हैं, यह सूक्ष्म शरीर बीज रूप से कर्म संस्कार स्मृतियों को लेकर एक स्थूल शरीर से दूसरे स्थूल शरीर में प्रवेश करता हैं। कठोपनिषद् में यमराज नचिकेता को कहते हैं – योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः। स्थाणुमन्यंऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम।।
यमराज कहते हैं, हे नचिकेता अपने-अपने शुभाशुभ कर्मो के अनुसार और शास्त्र, गुरू, संग, शिक्षा, ज्ञान, विवेक आदि के द्वारा देखे-सुने भावों से निर्मित अन्तः कालीन वासना के अनुसार मरने के पश्चात् कितने ही जीवात्मा दूसरा शरीर धारण करने के लिए वीर्य के साथ माता की योनि में प्रवेश कर जाते हैं। इनमें जिनके पुण्य-पाप समान होते हैं, वे मनुष्य का, जिनके पुण्य कम व पाप अधिक होते हैं, वे पशु-पक्षी का शरीर धारण करके उत्पन्न होते हैं, और कितने ही जिनके पाप अत्यधिक होते हैं, वे स्थावर भाव को प्राप्त होते हैं । अर्थात् वृक्ष, लता, तृण, पर्वत आदि शरीर में उत्पन्न होते हैं। त्रिवेदी ने बताया कि अलग-अलग ग्रन्थों में श्राद्ध के विभिन्न प्रकार बताये गये हैं। पर महर्षि विश्वामित्र ने प्रमुखतया बारह प्रकार के श्राद्धों का उल्लेख किया हैं, जो निम्न प्रकार हैं।नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि, पार्वण, गोष्ठी, शुद्धि, कर्मांग, दैविक,यात्रा, पुष्टि, त्रिवेदी ने बताया कि इनके अतिरिक्त निम्न श्राद्ध और भी हैं, जो ज्यादातर देखने में आते हैं।
एकोदिष्ट श्राद्ध, महालय श्राद्ध श्राद्ध के देश – प्रभास खण्ड में लिखा हैं कि अपने घर में श्राद्ध के दाता को तीर्थ से आठ गुणा पुण्य प्राप्त होता हैं। स्कंद पुराण में लिखा हैं कि, तुलसी के वन की छाया जहां-जहां हो वहां-वहां पितरों की तृप्ति के निमित्त श्राद्ध करें। त्रिस्थलीसेतु में वायुपुराण का वाक्य हैं कि शमी के पत्ते के समान भी गयाशिर में जो पिंड देता है, वह सात गोत्र और एक सौ एक कुल का उद्धार करता हैं । सात गोत्र यह हैं, माता, पिता, भार्या, भगिनी, पुत्री, पिता व माता की भगिनी इन सात गोत्रों के 101 पितरो को कुल कहते हैं।
श्रद्धा से किया गया श्राद्ध पितरों को उसी रूप में मिलता है, जिस रूप या योनि में पितृ होते हैं। जैसे यदि पितृ शुभ कर्म से देवता हुआ है तो उस देने वाले का अन्न अमृत होकर उसे प्राप्त होता हैं । यदि गन्धर्व हो तो भोग रूप से, पशु हो तो तृण रूप से, नाग होने पर वायु रूप से, यक्ष होने पर पान रूप से, राक्षस हो तो आमिष रूप से, दनुज हो तो मद्य रूप से, प्रेत हो तो रूधिरोधक और मनुष्य हो तो अन्नपानादि रूप से मिलता हैं। अतः प्रत्येक गृहस्थी को पितरों के निमित्त यथा शक्ति श्रद्धा से श्राद्ध करके पितरों को तृप्त करना चाहिएं।
त्रिवेदी ने बताया कि श्राद्ध में कदापि उपयोग न करें । मसूर, राजमा, प्याज, चणा, कपित्थ, अलसी, तीसी, सन, बासी भोजन और समुद्र जल से बना नमक। भैंस, हिरणी, ऊंटनी, भेड़ आदि का दूध भी वर्जित है। श्राद्ध किसी दूसरे के घर में, दूसरे की भूमि में कभी नहीं किया जाता है। मीडिया प्रभारी माणकमल भंडारी ने बताया कि 10 सितम्बर को प्रतिपदा का श्राद्ध, श्राद्ध प्रारम्भ, 11 सितम्बर को द्वितीया का श्राद्ध, 12 सितम्बर को तृतीया का श्राद्ध, 13 सितम्बर को चतुर्थी का श्राद्ध, 14 सितम्बर को पंचमी का श्राद्ध, भरणी नक्षत्र का श्राद्ध, 15 सितम्बर को षष्ठी का श्राद्ध, कृतिका नक्षत्र का श्राद्ध, 16 सितम्बर को सप्तमी का श्राद्ध, 17 सितम्बर को इस दिन कोई श्राद्ध नहीं है। 18 सितम्बर को अष्टमी का श्राद्ध, 19 सितम्बर को नवमी का श्राद्ध, सौभाग्यवती श्राद्ध (ऐसी विवाहित स्त्रियां जिनकी मृत्युतिथि ज्ञात न हो), 20 सितम्बर को दशमी का श्राद्ध, 21 सितम्बर को एकादशी का श्राद्ध, 22 सितम्बर को द्वादशी का श्राद्ध, सन्यासियों का श्राद्ध, 23 सितम्बर को त्रयोदशी का श्राद्ध, मघा नक्षत्र का श्राद्ध, 24 सितम्बर को चतुर्दशी का श्राद्ध, विष-शस्त्रादि से मृतकों का श्राद्ध, 25 सितम्बर को पूर्णिमा-अमावस्या का श्राद्ध, सर्वपिृत श्राद्ध (अज्ञात मृत्युतिथि वालों का भी श्राद्ध इसी दिन होगा) ।
|
व्हाट्सप्प आइकान को दबा कर इस खबर को शेयर जरूर करें |
[responsive-slider id=1466]
