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विज्ञापन केवल भावना या बाज़ार की भाषा नहीं है; यह साहित्य का एक जीवंत, समकालीन रूप है – लेखिका सुश्री रमा पांडे

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नई दिल्ली-भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त संस्था, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के मीडिया केंद्र ने समवेट सभागार में ‘विज्ञापनों में सितारों की चमक: एक अनूठी विज्ञापन प्रदर्शनी’ शीर्षक से एक विशेष प्रदर्शनी का आयोजन किया। प्रदर्शनी का उद्घाटन फिल्म एवं रंगमंच निर्देशक और लेखिका सुश्री रमा पांडे, आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी और संचार योजनाकार श्री सुशील पंडित ने किया। मीडिया केंद्र के नियंत्रक श्री अनुराग पुनेथा ने उद्घाटन भाषण दिया। प्रदर्शनी का संयोजन आईजीएनसीए के मीडिया केंद्र के श्री इकबाल रिजवी ने किया है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत इस विषय पर एक पैनल चर्चा का भी आयोजन किया गया।प्रदर्शनी ने सिनेमा जगत से परे जाकर इस बात पर प्रकाश डाला कि विज्ञापन ने सिनेमाई हस्तियों को रोजमर्रा की जिंदगी का अभिन्न अंग बनाने में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फिल्म सितारों ने जनमानस की पसंद, फैशन और आकांक्षाओं को आकार दिया और उनके द्वारा जगाए गए भरोसे ने उन्हें भारतीय विज्ञापन के विकास का केंद्र बना दिया। उत्पादों के साथ उनका संबंध भारत के दृश्य और सांस्कृतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण चरण को प्रदर्शित करता है, जिससे पता चलता है कि लोकप्रिय छवि और व्यावसायिक संचार ने मिलकर सामाजिक स्मृति और उपभोक्ता संस्कृति को किस प्रकार प्रभावित किया। यह उचित होगा कि हम स्वर्गीय पीयूष पांडे को श्रद्धांजलि अर्पित करें, जिन्होंने विज्ञापन जगत में योगदान भारतीय संचार की भाषा, कल्पना और सांस्कृतिक प्रतिध्वनि को नया रूप दिया।

इस अवसर पर रमा पांडे ने कहा, “विज्ञापन की दुनिया को केवल भावनाओं का क्षेत्र या बाज़ार की भाषा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह अपने आप में साहित्य का एक नया, जीवंत और समकालीन रूप है।” जिस प्रकार कविता कुछ शब्दों में गहरी भावनाओं को व्यक्त करती है, कहानियां सामान्य जीवन को अर्थ देती हैं और नाटक संवादों के माध्यम से मनुष्यों को एक दूसरे से जोड़ता है, उसी प्रकार विज्ञापन भी कुछ पंक्तियों, कुछ दृश्यों और क्षणभंगुर पलों के माध्यम से समाज से संवाद करता है।

विज्ञापन का उद्देश्य केवल उत्पाद बेचना नहीं है; यह उपभोक्ताओं के मन में विश्वास, अपनेपन की भावना और संबंध स्थापित करना है। जब विज्ञापन आम आदमी की भाषा में प्रस्तुत किया जाता है, जो उनके अनुभवों, यादों और जीवन से जुड़ता है, तो यह बाजार की सीमाओं को पार करके एक सांस्कृतिक दस्तावेज बन जाता है। यही कारण है कि कई विज्ञापन वर्षों तक हमारे मन में बसे रहते हैं—वे हमें मुस्कुराने पर मजबूर करते हैं, चिंतन करने के लिए प्रेरित करते हैं और अक्सर अपने समय की भावना को परिभाषित करते हैं।

आज, रेडियो से टेलीविजन, प्रिंट से डिजिटल और मोबाइल स्क्रीन तक, विभिन्न माध्यमों के तेजी से विकास के साथ, विज्ञापन की चुनौतियां और जिम्मेदारियां भी बढ़ गई हैं। ऐसे समय में, विज्ञापन के सफर को संरक्षित करना, उसका संग्रह करना और उसे समझना अत्यंत आवश्यक हो जाता है, क्योंकि यह न केवल ब्रांडों के इतिहास को दर्शाता है, बल्कि समाज की बदलती प्रकृति, आकांक्षाओं और सांस्कृतिक ताने-बाने को भी प्रतिबिंबित करता है। यह प्रदर्शनी विज्ञापन को एक रचनात्मक और बौद्धिक विधा के रूप में देखने का अवसर प्रदान करती है—एक ऐसा माध्यम जो भावनाओं से जन्मा, भाषा द्वारा आकारित हुआ और साहित्य की तरह ही समय के साथ अपना महत्व को स्थापित करता है।

इस अवसर पर श्री सुशील पंडित ने कहा, “वर्षों पहले, जब मैंने इंडियन एक्सप्रेस और बाद में द टेलीग्राफ के लिए लिखा था, तब उनके जीवन और कार्य को समझते हुए मुझे गहराई से यह अहसास हुआ कि विज्ञापन केवल उत्पादों को बेचने का एक माध्यम नहीं है – इसने हमेशा अपने समय के सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिवर्तनों को प्रतिबिंबित किया है।”

उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा था जब अखबार एक या डेढ़ रुपये में बिकते थे और उस कीमत में तो छपाई का खर्च भी पूरा नहीं होता था। ऐसे में, प्रिंट मीडिया को सहारा देने वाली असली ताकत विज्ञापन ही रहे। पत्रकारों की स्वतंत्रता, लेखन की निरंतरता और अखबारों व पत्रिकाओं का अस्तित्व ही विज्ञापन पर निर्भर रहा। विज्ञापन न केवल समाचार उद्योग को सहारा देते रहे, बल्कि साहित्य, कविता और सांस्कृतिक चर्चा को भी पोषण प्रदान करते रहे। रेडियो और अखबारों के युग से लेकर टेलीविजन के आगमन तक, विज्ञापन रोजमर्रा की जिंदगी का अभिन्न अंग बन गए और धीरे-धीरे सामूहिक स्मृति में समा गए।श्री पंडित ने कहा, “पीयूष पांडे का सबसे बड़ा योगदान विज्ञापन की भाषा को औपचारिकताओं से निकालकर सरल, आत्मीय और रोजमर्रा की बातचीत के अंदाज में बदलना था। यह ऐसी भाषा थी जो विश्वास पैदा करती है, जैसे दोस्तों के बीच बातचीत हो रही हो, उपभोक्ताओं से बराबरी का व्यवहार किया जाता है।” उन्होंने आगे जोर देते हुए कहा, “प्रौद्योगिकी, उत्पाद और सुविधाएं समय के साथ बदल सकती हैं और उनकी नकल भी की जा सकती है, लेकिन ब्रांड और उसके उपभोक्ता के बीच का भावनात्मक बंधन अमूर्त है—इसे दोबारा नहीं बनाया जा सकता। विज्ञापन की असली ताकत इसी रिश्ते को बनाने में है, जो मात्र आवश्यकता से परे जाकर इच्छा, वफादारी और विश्वास पैदा करता है।” डिजिटल युग पर विचार करते हुए उन्होंने कहा, “आज विज्ञापन के माध्यम बदल गए हैं और संचार अधिक नियोजित हो गया है, लेकिन चुनौतियां भी बढ़ गई हैं। नई पीढ़ी की भाषा, आकांक्षाएं और विश्वदृष्टि अलग हैं। उनसे जुड़ने के लिए यह समझना आवश्यक है कि संचार केवल कही गई बातों के बारे में नहीं है, बल्कि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि उन्हें कैसे कहा गया है।”श्री पंडित ने संबोधन के समापन में कहा, “यह प्रदर्शनी भारतीय विज्ञापन के लंबे सफर को समझने का अवसर प्रदान करती है, जिसने उपभोक्ता संस्कृति, रचनात्मक अभिव्यक्ति और सामाजिक व्यवहार को आकार दिया है। मैं इस प्रयास के लिए आयोजकों को बधाई देता हूं, क्योंकि अतीत को समझे बिना भविष्य की दिशा तय करना कठिन है।”इस अवसर पर अपने उद्घाटन भाषण में श्री अनुराग ने कहा कि आईजीएनसीए की विज्ञापन संग्रह पहल इस बहुमूल्य दृश्य अभिलेख को समृद्ध और विस्तारित करने के लिए समर्पित है। इस प्रदर्शनी के माध्यम से, यह पहल न केवल विज्ञापनों को संरक्षित करती है, बल्कि भारत की रचनात्मक विपणन यात्रा का एक संरचित संग्रह भी तैयार करती है—जिसमें इसकी सौंदर्यशास्त्र, भाषा, हास्य, सामाजिक प्रभाव और पुरानी यादें शामिल हैं। इस अवसर पर विज्ञापन के छात्र, शोधकर्ता, उत्साही और दर्शक उपस्थित हुए।

 

 

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