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साहित्यसंवाद : महाभारत काल के हनुमानजी की भूमिका पर अंशु हर्ष ने की विस्तृत चर्चा

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अलवर। सरिस्का की पावन वादियों में मंगलवार सुबह “सरिस्का साहित्य संवाद” की शुरुआत प्रकृति के सान्निध्य में आयोजित सरिस्का वॉक से हुई। देश के विभिन्न हिस्सों से आए साहित्यकारों, लेखकों, शोधार्थियों एवं चिंतकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। हरे-भरे जंगलों और शांत वातावरण के बीच सभी प्रतिभागियों ने पांडुपोल हनुमान मंदिर में दर्शन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।अरावली की गोद में स्थित पांडुपोल हनुमान मंदिर धार्मिक एवं ऐतिहासिक आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि वनवास काल के दौरान पांडवों ने इसी क्षेत्र में निवास किया था। आसपास का घना जंगल और प्राकृतिक परिवेश आज भी महाभारत काल की स्मृतियों को जीवंत कर देता है।मंदिर परिसर में आयोजित विशेष साहित्यिक सत्र “हनु प्रज्ञा” में ‘महाभारत के हनुमान’ की लेखिका अंशु हर्ष ने महाभारत काल में हनुमानजी की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने भीम और हनुमानजी के संवाद का उल्लेख करते हुए बताया कि यह प्रसंग केवल शक्ति-परीक्षण का नहीं, बल्कि विनम्रता, आत्मबोध और धर्म की स्थापना का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि हनुमानजी महाभारत में प्रत्यक्ष रूप से कम, किंतु प्रतीकात्मक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं—वे धर्म, संयम और आंतरिक शक्ति के प्रतीक हैं। अहंकार को छोड़ने की राह दिखाते हैं।अपने विचार रखते हुए उन्होंने यह भी कहा कि हनुमानजी की उपस्थिति हमें यह सिखाती है कि वास्तविक बल अहंकार में नहीं, बल्कि मर्यादा और सेवा भाव में निहित है। सत्र के दौरान श्रोताओं ने जिज्ञासापूर्ण प्रश्न पूछे, जिनका वक्ता ने विस्तार से उत्तर दिया।कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने सभी प्रतिभागियों, वक्ताओं एवं सहयोगियों का आभार व्यक्त किया। प्रकृति, आस्था और साहित्य के सुंदर संगम ने इस संवाद को एक विशेष आयाम प्रदान किया।

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