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आचार्य के चातुर्मास नगर प्रवेश पर सोमैला कर किया स्वागत ,भव्य वरघोड़े में उमड़ा सैलाब

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सायला/जालौर -(प्रियंक दवे)। शहर में आचार्य विजय जयरत्न सुरीश्वर महाराज के 2026 के चातुर्मास निमित भव्य नगर प्रवेश हुआ।जिसके श्रावक श्राविकाओं ने श्रद्धापूर्वक भाग लिया।
नगर प्रवेश को लेकर शांतिपुरा स्थित पार्श्वनाथ जैन मंदिर श्रीसायला जैन संघ के श्रावक श्राविकाएं पारंपरिक वेशभूषा में सजधज कर पहुंच गए थे। प्रात:आठ बजे जैसे ही आचार्य का मुनि मंडल के साथ नगर प्रवेश हुआ।पूरा माहौल भक्तिमय हो गया तथा गुरुदेव के जयकारों की गूंज उठी।नगर प्रवेश पर ढोल ढमाकों के साथ महिलाओं ने मंगल गीत के साथ भव्य सोमैया किया।जिन्हें आचार्य ने वाक्षेप से आर्शीवाद दिया।सोमैला के बाद आचार्य ने मंदिर में दर्शन वंदन किया।मंदिर में दर्शन कर वरघोड़े के रूप में पुराना बस स्टेंड,पोस्ट ऑफिस रोड होते हुए श्रीकुंथुनाथ मंदिर पहुंचकर दर्शन वंदन किया।इसके बाद आम चौहटे स्थित श्रीसुपार्श्वनाथ जैन मंदिर में दर्शन वंदन किया।नगर प्रवेश पर जैन समाज की ओर से जगह जगह स्वागत वंदन कार्यक्रम का आयोजन किया।तथा आचार्य के चरणों में वंदन कर आर्शीवाद लिया।
वरघोड़े में श्री जैन सायला,जैन युवा मंच सहित बड़ी संख्या में श्रावक श्राविकाएं उपस्थित थे।
वहीं विभिन्न शहरों व गांवों से आए जैन संघों ने चार्तुमास निमित कार्यक्रम का आमंत्रण देते हुए आने की विनती की।साथ ही आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की जानकारी दी।
श्रीसकल संघ को बड़ी संख्या में पधारकर धर्मलाभ लेने की बात कही।
चातुर्मास से आराधना से पुण्य प्राप्ति
चार्तुमास निमित नगर प्रवेश पर प्रवचन का आयोजन किया गया।प्रवचन में आचार्य विजय जयरत्न सुरीश्वर महाराज ने कहाकि चातुर्मास में मुनि भगवंतो की निश्रा में विभिन्न धार्मिक आराधना आदि का आयोजन होता है।जिसमें सहभागिता से पुण्य,संस्कार व धर्मलाभ प्राप्ति होती है।शरीर में नवीन ऊर्जा के संचार होने से मन से लोभ काम क्रोध,ईर्ष्या आदि अवगुणों का निवारण हो जाने से सच्चे आराधक बन जाने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। साथ धर्म की ओर मन प्रबल होता है।उन्होंने सभी को सामूहिक रूप से तप धर्म करने की बात कही।इसी सायला की धरा पर पुण्य सम्राट ने 2012में ऐतिहासिक चातुर्मास कर धर्म की अलख जगाई थी।
इसके बाद चातुर्मास निमित आचार्य को कांबली वोहराणा का चढ़ावा बोला गया।जिसके लाभार्थी श्रीमती सुआदेवी लालचंद भंडारी परिवार ने लाभ लेते हुए आचार्य को कांबली वोहराणा की गई।

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