डीएवाई-एनआरएलएम ने जमीनी स्तर पर किए जाने वाले प्रयासों में तालमेल के लिए उद्योग जगत के साथ सीएसआर सम्मेलन आयोजित किया।
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श्रीमती नीता केजरीवाल, संयुक्त सचिव, ग्रामीण आजीविका (जेएस, आरएल) ने जमीनी बदलाव को प्रभावी बनाने में चुनौतियों और अवसरों के माध्यम से सरकार की नीतियों के बीच संमिलन की असीमित संभावनाओं के बारे में बताया।

श्री रमन वाधवा उप निदेशक, डीएवाई-एनआरएलएम ने सम्मेलन का समन्वय करते हुए डीएवाई-एनआरएलएम फ्रेमवर्क के बारे में बताया और सम्मेलन में प्रमुख बातों पर प्रकाश डाला।

भाग लेने वाले कॉर्पोरेट घरानों ने ग्रामीण क्षेत्रों में अपने वर्तमान कार्यों का उदाहरण देते हुए ग्रामीण विकास मंत्रालय की इस योजना में साथ देने की इच्छा व्यक्त की।
यह इस श्रृंखला का पहला सम्मेलन है जिसका लक्ष्य ग्रामीण क्षेत्रों में कल्याणकारी पहलों को सुव्यवस्थित करने के लिए सरकार के मंच पर कॉर्पोरेट घराने के सीएसआर विंग के प्रमुख अधिकारियों को एक साथ लाना है ।
पृष्ठभूमि: सीएसआर व्यय में ग्रामीण विकास का हिस्सा
ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यह जरूरी नहीं कि सीएसआर बजट का खर्च किसी कंपनी की सीएसआर पहल की प्रभावशीलता या प्रभाव को दिखाता हो। यह भी चिंता की बात है कि कंपनियां अनिवार्य खर्च को पूरा करने के लिए नाममात्र के दान या ऐसी सीएसआर गतिविधियां कर रही हैं जिनमें रणनीतिक योजना और प्रभाव मूल्यांकन का अभाव है। इसके अतिरिक्त, भारत में सीएसआर पहलों के कार्यान्वयन में अधिक पारदर्शिता और उत्तरदायित्व की आवश्यकता है। नीचे दिया गया ग्राफ वित्तीय वर्ष2020-21 में सीएसआर बजट के अनुपालन की स्थिति दर्शाता है:

उद्योगों के सामाजिक उत्तरदायित्व अनुपालन 2021
उद्योगों के सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) पहलों को उनके कार्यान्वयन में कई मुश्किलों या चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, उनमें से कुछ हैं:
- क्षेत्रीय विषमता: कारोबार करने वाली जगह पर रकम के खर्च को लेकर नियम की बाध्यता के कारण यह देखा गया है कि एक ही भौगोलिक क्षेत्र में कई संगठन काम कर रहे हैं, जबकि कुछ क्षेत्रों में थोड़ा ही खर्च होता है। इससे क्षेत्रीय विषमता बढ़ती है जहां कुछ समुदायों को कोई भी मदद नहीं प्राप्त हो रही है।
- सेक्टर में विषमता: सीएसआर अधिनियम के अनुसार, प्रत्येक संगठन के पास एसडीजी के अनुसार परिभाषित क्षेत्रों पर खर्च करने का सीएसआर अधिदेश है। जैसा कि प्रत्येक संगठन स्वतंत्र रूप से अपना खर्च तय कर सकता है, इसलिए यह देखा गया है कि कुछ क्षेत्रों को बहुत अधिक धन प्राप्त हो रहा है,जबकि अन्य क्षेत्रों को पर्याप्त आवंटन नहीं मिल पा रहा है।
- बजट में शेष रकम का हल: अधिनियम में नवीनतम संशोधन के अनुसार कंपनियों को वित्त वर्ष के अंत में बिना इस्तेमाल की गई रकम को अनुसूची VII के तहत निर्धारित फंड में जमा करना होगा।
- कार्यान्वयन के लिए सही भागीदार: संभव है कि कंपनियां अपने पक्षधारकों, जैसे समुदायों, गैर-सरकारी संगठनों और अन्य संगठनों के साथ प्रभावी रूप से संलग्न नहीं हो पा रही हों,इसलिए सही कार्यान्वयन एजेंसी की तलाश एक कठिन कार्य है।
- एक ही परियोजना क्षेत्र में गतिविधियों का दोहराव: संभव है कि कंपनियों के पास सभी लाभार्थियों और उन्हें विभिन्न सीएसआर पहल से प्राप्त होने वाली मदद के बारे में जानकारी न हो,इसलिए परियोजना क्षेत्र के खर्च में दोहराव की संभावना अधिक होती है, जहां एक ही लाभार्थी को दोबारा लाभ प्राप्त हो सकता है।
- सीमित संधारणीयता: संभव है कि कंपनियां दीर्घकालिक प्रभावों पर ध्यान केंद्रित न कर सकें और न ही उनके पास ऐसी क्षमता हो कि वो और बेहतर प्रभाव पाने के लिए अपनी सीएसआर पहलों को उसी पैमाने पर बढ़ा सकें।
- प्रभाव की जगह अनुपालन पर जोर: कंपनियां अपना अधिकांश जोर सीएसआर पहलों के प्रभावों की जगह इससे जुड़े नियमों को पूरा करने पर दे सकती हैं।
- सांकेतिक दान: कंपनियां अनिवार्य खर्च को पूरा करने के लिए सिर्फ नाममात्र का दान कर सकती हैं या ऐसी सीएसआर गतिविधियाँ कर सकती हैं जिनमें रणनीतिक योजना और प्रभाव मूल्यांकन की कमी होती है।
- सामुदायिक भागीदारी का अभाव: अधिकांश कंपनियां व्यय पर ध्यान केंद्रित करती हैं, लेकिन सिस्टम की कमी के कारण समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करने में विफल हो सकती हैं।
पृष्ठभूमि: डीएवाई-एनआरएलएम
दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (डीएवाई-एनआरएलएम) एक प्रमुख गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम है,जिसका उद्देश्य गरीब परिवारों को लाभकारी स्वरोजगार और कौशल युक्त रोजगार से आय के अवसरों तक पहुंच बनाने में सक्षम बनाना है जिससे गरीबों को आजीविका के स्थायी और विविधतापूर्ण विकल्प उपलब्ध हों। यह गरीबों की आजीविका में सुधार के लिए दुनिया की सबसे बड़ी पहलों में से एक है। मिशन चार मुख्य घटकों में निवेश के माध्यम से अपने उद्देश्य को प्राप्त करना चाहता है, जो हैं (क) ग्रामीण गरीब महिलाओं के स्व-प्रबंधित और वित्तीय रूप से स्थायी सामुदायिक संस्थानों को बढ़ावा देना और मजबूती एवं सामाजिक गतिशीलता प्रदान करना (ख) वित्तीय समावेशन; (ग) स्थायी आजीविका; और (घ) सामाजिक समावेशन, सामाजिक विकास और संमिलन के माध्यम से अधिकारों तक पहुंच।
मिशन ने गहन रणनीति के तहत सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (दिल्ली और चंडीगढ़ को छोड़कर) के 709 जिलों में फैले6811 ब्लॉक को कवर किया है।
76.5 लाख स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) में 8.33 करोड़ महिलाओं को जोड़ा गया है। इसके अलावा, कार्यक्रम के तहत पहचाने गए 1951 मॉडल सीएलएफ में कार्यान्वयन शुरू किया गया।
डीएवाई-एनआरएलएम खेती से जुड़े कदमों को उठाकर लंबे समय तक कायम रहने वाली कृषि, पशुधन और सघन ब्लॉक में एनटीएफपी को बढ़ावा देता है। इन कदमों का ध्यान प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण, और कृषि-पारिस्थितिक कार्य प्रणालियों के साथ पशुधन से जुड़ी कार्य प्रणालियों को बढ़ावा देने पर है जिससे फसल और पशु उत्पादकता बढ़ाई जा सके। अब तक, 3.10करोड़ महिला किसानों को इन कदमों में शामिल किया गया है। इसके अलावा, 14 लाख से अधिक महिलाओं को उत्पादक समूहों/उत्पादक कंपनियों में और लगभग 3.86 लाख एसएचजी सदस्यों को 183 उत्पादक कंपनियों से जोड़ा गया है।.
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