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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शीतला सप्तमी का पूजन 14 मार्च को ।

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शास्त्री प्रवीण त्रिवेदी ने बताया कि 13 मार्च सोमवार को रांधण छठ को भोजन पकाया जाएगा । जिसका शुभ मुहूर्त प्रातः 6.54 से 8.23 तक अमृतवेला, 9.52 से 11.22 तक शुभ, दोपहर 3.50 से 6.48 तक लाभ अमृत वेला का रहेगा । इसी प्रकार 14 मार्च मंगलवार को सुबह 9:52 से 11. 21 तक चल, 11.21 से 12. 51 तक लाभ और दोपहर 12.51 से 2:00  तक अमृत वेला में पूजन करें । हिंदू धर्म में शीतला सप्तमी का बहुत महत्व है। हर साल यह पर्व चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को बासोड़ा या शीतला सप्तमी का पर्व मनाया जाता है। शीतला सप्तमी का वर्णन स्कंद पुराण में भी मिलता है। इसके अनुसार देवी शीतल को दुर्गा और पार्वती का अवतार माना गया है और इन्हें रोगों से उपचार की शक्ति प्राप्त है। मान्यता है कि इस दिन के बाद से बासी खाना उचित नहीं होता है। यह सर्दियों का मौसम खत्म होने का संकेत होता है और इसे इस मौसम का अंतिम दिन माना जाता है। इस पूजा को करने से ओली और शीतला माता प्रसन्न होती हैं । उनके आर्शीवाद से दाहज्वर, पीतज्वर, विस्फोटक, दुर्गंधयुक्त फोड़े, शीतला की फुंसियां, शीतला जनित दोष और नेत्रों के समस्त रोग दूर हो जाते हैं।   मीडिया प्रभारी माणकमल भंडारी ने बताया कि इस दिन लोग सूर्योदय से पहले उठकर ठंडे जल से स्नान करते हैं। इसके बाद शीतला माता के मंदिर में जाकर देवी को ठंडा जल अर्पित करके उनकी विधि-विधान से पूजा करते हैं। श्रीफल अर्पित करते हैं और एक दिन पूर्व पानी में भिगोई हुई चने की दाल चढ़ाते है। शीतला माता को ठंडे भोजन का नैवेद्य लगता है । इसलिए भोजन एक दिन पहले हलवा, पूरी, दही बड़ा, पकौड़ी, पुए, रबड़ी आदि बनाकर रख लिया जाता है। अगले दिन सुबह महिलाएं इन चीजों का भोग शीतला माता को लगाकर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। इस दिन शीतला माता समेत घर के सदस्य भी बासी भोजन ग्रहण करते हैं। इसी वजह से इसे बासौड़ा पर्व भी कहा जाता है।

शीतला सप्तमी की कथा सुनने के बाद घर आकर मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों ओर हल्दी से हाथ के पांच पांच छापे लगाए जाते हैं। जो जल शीतला माता को अर्पित किया जाता है, उसमें से थोड़ा सा बचाकर घर लाते हैं और उसे पूरे घर में छींट देते हैं। इससे शीतला माता की कृपा बनी रहती है और रोगों से घर की सुरक्षा होती है। शीतला सप्तमी के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता है।

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