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पितरों के उद्देश्य से विधिपूर्वक कर्म ही श्राद्ध है- शास्त्री।

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भीनमाल  ।श्री दर्शन पंचांग के प्रधान संपादक शास्त्री प्रवीण त्रिवेदी ने बताया कि पितरों के उद्देश्य से विधिपूर्वक जो कर्म श्रद्धा से किया जाता है, उसे श्राद्ध कहते है ।श्रद्धया_पितृन्_उद्दिष्य_विधिना_क्रियते_यत्कर्म_तत्_श्राद्धम्।श्रद्धा से ही श्राद्ध की निष्पत्ति होती है । अपने मृत पितृगणों के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक किया जाने वाला कर्म विशेष को श्राद्ध शब्द के नाम से जाना जाता है। इसे ही पितृयज्ञ भी कहते हैं । शास्त्री ने बताया कि श्राद्ध में दी गयी अन्न आदि सामग्रियां पितरों को नाम गोत्र के माध्यम से विश्वेदेव एवं अग्निश्वात्त आदि दिव्य पितर हव्य-कब्य को पितरों प्राप्त करा देते हैं। यदि पिता देवयोनि को प्राप्त हो गया तो दिया गया अन्न उसे वहां अमृत रूप होकर प्राप्त हो जाता है। मनुष्य योनि में अन्न रूप में तथा पशु योनि में तृण रूप में उसे उसकी प्राप्ति होती है।नागादि योनियों में वायु रूप से, यक्ष योनि में पान रूप से तथा अन्य योनियों में भी उसे श्राद्धीय वस्तु भोगजनक तृप्तिकर पदार्थो के रूप में प्राप्त होकर अवश्य तृप्त करती है । मनु ने लिखा है कि ब्राह्मण के मुख से देवता हव्य को और पितर क़व्य को ग्रहण करते हैं। ये मनोजव होते हैं अर्थात इन पितरों की गति मन की गति की तरह होती है। ये स्मरण से ही श्राद्ध देश मे आ जाते हैं और ब्राह्मणों के साथ भोजन कर तृप्त हो जाते हैं। इनको सब लोग इसलिये नही देख पाते क्योकि इनका शरीर वायवीय होता है । भविष्य पुराण के अनुसार श्राद्ध 12 प्रकार के होते हैं । जो इस प्रकार हैं । नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि, सपिण्डन, पार्वण, गोष्ठी, शुद्धर्थ, कर्मांग, दैविक, यात्रार्थ, पुष्टयर्थ । श्राद्ध में जौ, कांगनी, मटर सरसों का उपयोग श्रेष्ठ रहता है । तिल की मात्रा अधिक होने पर श्राद्ध अक्षय हो जाता है एवं श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों द्वारा ही होती है । दोनों संध्याओं के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए । दिन के आठवें मुहूर्त (कुतपकाल) में पितरों के लिए दिया गया दान अक्षय होता है। चना, मसूर, उड़द, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बासी, अपवित्र फल या अन्न श्राद्ध में निषेध हैं।29 को पूर्णिमा व प्रतिपदा श्राद्ध, 30 को द्वितीया श्राद्ध, 1 को तृतीया श्राद्ध, 2 को चतुर्थी श्राद्ध, 3 को पंचमी श्राद्ध, 4 को षष्ठी श्राद्ध, 5 को सप्तमी श्राद्ध, 6 को अष्टमी श्राद्ध, 7 को मातृ नवमी श्राद्ध, 8 को दशमी श्राद्ध, 9 को एकादशी श्राद्ध, 11 को द्वादशी श्राद्ध, संयासी श्राद्ध, 12 को त्रयोदशी श्राद्ध, 13 को चतुर्दशी श्राद्ध, दग्ध शस्त्रादिहत श्राद्ध, 14 को सर्वपितृ अमावस्या श्राद्ध ।

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