रेल का सफ़र और अनुभव की लाइब्रेरी का साथ… ‘पूरी दुनिया के फ़लसफ़े का जिक्र।
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।। रेल यात्रा डायरी।। बचपन में बसों के सफर के दौरान पटरियों से धड़ धड़ करती ट्रेन को गुजरते देखकर मैं रोमांचित हो उठता था। जब तीसरी क्लास में था तब मां – पिताजी (भाऊ- जिसा) के साथ पहली बार ननिहाल सांचोर से आते समय ट्रेन से रानीवाड़ा से भीनमाल तक का सफर किया। उसके 7 साल बाद जाकर भीनमाल से जोधपुर पढ़ने के लिए जाते समय अक्सर बूटा मेल में सफर करता रहा हूं। बड़ा होने के बाद रेल यात्रा का क्रेज़ बढ़ा है। हालांकि हमारे भीनमाल से जयपुर – दिल्ली के रूट पर आज तक सीधी ट्रेन नहीं होने से बस ही विकल्प है। आज भीनमाल से आंध्रप्रदेश जाने के लिए अहमदाबाद तक आकर ट्रेन बदलनी पड़ी है। मैंने बचपन में महात्मा गांधी को पढ़ा था, जिसमें उन्होंने ज़िक्र कर रखा था कि आपको भारत को जानना है तो ट्रेन में सफर करना चाहिए। गांधी जी औसत दर्जे के डिब्बे में बैठकर ट्रेन से यात्रा करते थे। मेरा मानना है कि आपके देश- प्रदेश में क्या चल रहा है, दुनिया क्या सोच रही है, केंद्र और राज्य सरकार के बारे में पब्लिक फीडबैक क्या है, इसकी सटीक जानकारी हासिल करने के लिए रेल की यात्राएँ मदद करती हैं। भीनमाल से हम स्लीपर क्लास से अहमदाबाद पहुंचे। अब अहमदाबाद से यशवंतपुर एक्सप्रेस में थर्ड एसी से अनन्तपुर के लिए रवाना हुए है। मैंने अनुभव किया कि यहां ज्यादा पढ़े लिखे लोग मोबाइल या किताबों में खोए नज़र आते है। वो हमारे आपस में बतियाने पर भी घूरते नज़र आते है। वहीं इस यात्रा में माध्यम वर्गीय यात्री आज भी आपस में बात करते हुए मिल गए। मुझे ट्रेन में गहलोत- पायलट विवाद, कांग्रेस का भविष्य, राजस्थान वसुंधरा राजे, गजेंद्र सिंह- सतीश पूनिया- ओम बिरला- ओम माथुर- अश्विनी वैष्णव – चंद्रशेखर आदि तमाम नेताओं के समीकरणों के बारे में एक से बढ़कर एक नए एंगल – दृष्टिकोण के बारे में पब्लिक व्यूज़ जानने- समझने – सुनने को मिले। गुजरात चुनावों में भाजपा- कांग्रेस- आम आदमी पार्टी के बारे में कई तरह की बातें – चर्चाएं यहां सुनने – जानने को मिली। हालांकि डिब्बे के दूसरे कंपार्टमेंट में मां की गोद में बैठे बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक, एकटक मोबाइल फ़ोन में व्यस्त दिखे। चलती ट्रेन में कुछ लोग किताबें पढ़ते हुए भी दिखे। कुछ लोग मोबाइल पर बतियाते ही जा रहे है। मैं तो इस तरह के सफर में किताबें पढ़ना पसन्द नहीं करता। क्योंकि मेरे साथ इस सफर में धोती – साफा पहनने बांधने वाली पीढ़ी के हमारे परिवार के लोग बैठे है। जो सभी अनुभव की खान है। ये सभी जिंदगी की खुली किताब की मानिंद है। उनमें से एक – एक का अनुभव सौ – सौ किताबों के बराबर है। इसलिए मैं इस सफर में विरासत में पीढ़ी दर पीढ़ी से चलते आ रहे इस ज्ञान के खजाने से अमृत की बूंदे चखने का आनंद लेने की कोशिश कर रहा हूं। चलती फिरती लाइब्रेरी की मानिंद श्री मंगल सिंह जी दाता कोमता, भैर सिंह जी बासा दहिया पुनडाउ, हरदान सिंह जी चौहान भगलसेफ्टा, उम्मेद सिंह जी देवडा नरता, जीव सिंह जी चौहान, शंकरलाल जी पुरोहित पादरा, मान सिंह जी सोलंकी नरता, नारायण जी जोशी सरथला, छतर सिंह जी गहलोत दासपां, दीप सिंह जी दहिया पोषाणा, भंवर सिंह जी अरनू, वगत सिंह जी अरनू जैसे लोगों से उनके जिंदगी के अनुभव की बातें, दुनिया के बारे में उनका नज़रिया, उनकी सोच- विचार आदि को मैं पढ़ने- समझने की कोशिश कर रहा हूं। इस लाइब्रेरी में हँसने रोने की बातें है। संवेदना है तो निष्ठुरता भी है। दर्द है तो उसकी दवा भी है। जिंदगी की रपटीली पगडंडियों की हकीकत भी है। व्यवहार में विनम्रता है। संसार का मायाजाल है तो उसकी भी काट है। रिश्तों की मिठास है तो दरकते रिश्तों की कड़वी बातें भी सुनने को मिलेगी। कड़वे- मीठे अनुभव है। मुश्किलों के पहाड़ चढ़ने की कहानी है। यहां धूप में पके हुए सफेद बालों में बूढ़े बरगद सी छांव है। किताबों जैसी सैद्धान्तिक बातें नहीं वरन व्यवहारिकता का वेद विज्ञान है। मैं इसलिए सफर में किताबों की गठरी उठाकर नहीं चलता।
इस रेल के सफर में जिंदगी के यात्री के रूप में तय किया कि इस बार मोबाइल में सर खपाने के बजाय इस चलती – फिरती लाइब्रेरी में से मोती बटोरने की कोशिश कर रहा हूँ। मैं जिंदगी के इस सफर में एक यात्री के रूप में रोजाना नए नए लोगों से मिलने, उनके अनुभव को जानने और समझने की कोशिश में लगा रहता हूँ। किताबें पढ़ने के लिये मुझे इतना वक्त नहीं मिलता है। मुझे इस ट्रेन में 24 घंटे का सफर करना है, देखता हूँ कि चलती फिरती अनुभव की लाइब्रेरी से कितना ग्रहण कर पाऊं।
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सादर श्रवण सिंह राठौड़
।। यशवंतपुर एक्सप्रेस।।
।। सफर :- अहमदाबाद से अनन्तपुर आंध्रप्रदेश।।
।। दिनांक :- 29- 30 नवम्बर 2022।।
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