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मेरे गुरूदेव मेरे भगवान “विद्या और दौलत की भावपूर्ण विनयांजलि”

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बामनवास- श्रमण परम्परा के सूर्य और चाँद व सतत संयम तप पूर्वक आत्मा में रमने वाले एवं भारत की पवित्र धरा पर पिछले कई दशकों से उन्मुक्त विचरण करने वाले जिन्होंने स्वयं के कल्याण के साथ हम जैसे जीवों के कल्याण के लिए शाश्वत मोक्षमार्ग की शिक्षा देकर हम सभी पर परम उपकार किया और लोकोत्तर यात्रा पर निकल गये ऐसे जिन शासन के दो महान जैनाचार्य की विनयांजलि सभा का आयोजन बामनवास ब्लॉक के सभी जैन मन्दिरों में आयोजित किया गया । जिनमे एक सूर्य की तरह तेजस्वी पूज्य आचार्य विद्यासागर जी महाराज और दूसरे चाँद की तरह शीतल पूज्य आचार्य दौलत सागर जी महाराज का मिलन महाविदेह में सूरज और चाँद के मिलन की भांति है।इस अवसर पर दिगम्बर जैन मन्दिर पिपलाई में कई श्रावक-श्राविकाओं के द्वारा संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 श्री विद्यासागर जी मुनिराज एवं जैनाचार्य श्री दौलत सागर जी महाराज साहेब को समतापूर्वक समाधि सल्लेखना पर पुष्प चढ़ाकर भावपूर्ण विनयांजलि अर्पित करते हुए परम उपकारी दोनो गुरुदेवों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की ।इस अवसर पर दिगम्बर जैन समाज पिपलाई के प्रवक्ता बृजेन्द्र कुमार जैन ने संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 श्री विद्यासागर जी मुनिराज के बारे में बताया कि संयम और ज्ञान की चलती फिरती महापाठशाला के विद्यासागर जी ऐसे अनोखे आचार्य थे जो न सिर्फ कवि,साहित्यकार और विभिन्न भाषायों के वेत्ता थे बल्कि न्याय,दर्शन,अध्यात्म और सिद्धांत के महापंडित भी थे,ज्ञान के क्षेत्र में जितने ऊँचे थे,उससे कहीं अधिक ऊँचे वैराग्य,तप,संयम की आराधना में थे। ऐसा मणि-कांचन संयोग सभी में सहज प्राप्त नहीं होता।विद्यासागर सिर्फ उनका नाम नहीं था यह उनका जीवन था,वे चलते फिरते पूरे एक विशाल विश्वविद्यालय थे,वे संयम,तप,वैराग्य,ज्ञान विज्ञान की एक ऐसी नदी थे जो हज़ारों लोगों की प्यास बुझा रहे थे,कितने ही भव्य जीव इस नदी में तैरना और तिरना दोनों सीख रहे थे।कितने ही उन्हें पढ़कर व सुनकर और देख कर जानते थे और न जाने ऐसे कितने लोग थे जो उन्हें जीने की कोशिश करके उन्हें जानने का प्रयास कर रहे थे।इन सबके बाद भी आज बहुत से लोग ऐसे हैं जो कुछ नया जानना चाहते हैं , जीवन दर्शन को समझना चाहते हैं और जीवन के कल्याण की सच्ची विद्या सीखना चाहते हैं उन्हें इस सदी के महायोगी दिगम्बर जैन आचार्य विद्यासागर महाराज के जीवन और दर्शन अवश्य देखकर,पढ़कर और जीकर सीखना चाहिए ।इस अवसर पर राजस्थान समग्र जैन युवा परिषद् के अध्यक्ष जिनेन्द्र जैन ने बताया कि आगम ग्रन्थों का प्रकाश फैलाने वाले संघ स्थाविर श्री सागर समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति,दीर्घ संयमी परम पूज्य आचार्य भगवंत श्री दौलत सागर सूरीश्वर जी म.सा.जन्म से जैन नहीं थे,लेकिन जैन धर्म के प्रति उनके मन में गहरा लगाव होने के कारण मात्र 18 वर्ष की उम्र में घर से भागकर दीक्षा लेने वाले आचार्य श्री ने 85 वर्षों तक साधु धर्म का पालन करते हुए सबसे अधिक दीक्षा पर्याय वाले आचार्य भगवंत बने। पूज्य श्री ने जैन जन्म से नही कर्म से बना जाता है इस बात को प्रमाणित किया। जन्म से अजैन होने के बावजूद भी वर्तमान समय में संघ स्थाविर पद पर विराजित हुए ।उतना ही नही वर्तमान में 45 आगम कंठस्थ करने वाले वे एकमात्र आचार्य थे लगभग 900 साधु, साध्वी उनकी आज्ञा में थे। हाथ में माला, हृदय में आगम और होटों पर प्रभु वचन आचार्य श्री इस त्रिकुटी के साक्षात्कार थे। इतने बड़े सर्वोच्च पद पर आसीन होने के बाद भी उनका व्यवहार सहज व सरल था। उनका वियोग होना देश एवं समाज के लिए बहुत बड़ी क्षति है एवं ऐसे संत धरती पर बरले ही पैदा होते हैं। इस अवसर पर सुनील जैन,मुकेश जैन,विनोद जैन,आशीष जैन,आशा जैन,राजुल जैन,सुमनलता जैन,रजनी जैन,एकता जैन,सपना जैन , अभिनन्दन जैन सहित कई श्रावक श्राविकाएं उपस्थित थे।

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