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विमर्श कार्यक्रम में साहित्य, सुरक्षा और स्वास्थ्य की त्रिधारा ने सराबोर किया,”सुरक्षा सखी’ पुस्तकें नि:शुल्क वितरित करने की घोषणा की

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बीकानेर-रविवार की सुबह चन्द्रा इन के सभागार में सृजना द्वारा आयोजित सुरक्षा सखी विमर्श कार्यक्रम में खचाखच भरे सभागार में श्रोताओं ने पहली बार जीवन के तीन प्रमुख आधार साहित्य, सुरक्षा और स्वास्थ्य का अद्भुत समन्वय देखा।अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक तथा ‘सेव यूथ सेव नेशन’, ‘कमजोर वर्गों का सशक्तीकरण’ और ‘अप्प दीपो भव’ पुस्तकों की लेखिका सीमा हिंगोनिया ने अपनी हालिया पुस्तक ‘सुरक्षा सखी’ की रचनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि ये काल्पनिक नामों की सच्ची कहानियाँ हैं । इन पात्रों के असहनीय दर्द और उनके असुरक्षा भाव ने मुझे ये कहानियाँ लिखने को प्रेरित किया । मैंने अनुभव किया कि आधी आबादी को भावनात्मक और सूचनात्मक रूप से मजबूती मिलनी चाहिए । उन्होंने बताया कि प्रायः लड़कियों के यौन शोषण के अपराधी परिवार के ही सदस्य होते हैं । लड़कियाँ समाज की मानसिक संरचना के कारण आवाज उठा नहीं पाती अथवा उनकी आवाज को अनसुना कर दिया जाता है । इन सच्ची कहानियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि बाल विवाह, ट्रिपल तलाक, भ्रूण हत्या, दहेज उत्पीड़न, ब्लैकमेलिंग, लिवइन रिलेशनशिप, शारीरिक सुख पाने का लालच, छलावे भरी मानसिक सुरक्षा या फिर एआई के युग में छुप कर बनाए गए वीडियो जैसी स्थितियों से पीड़ित महिलाओं के दुखों का निवारण सुरक्षा सखी का पहला उदद्देश्य है । पर यह भी एक दुःखद सच है कि महिलाओं को न्याय दिलाने की राह में महिलाएं ही सबसे बड़ी बाधा है । यह पुस्तक महिलाओं में विश्वास और साहस जगाने की एक ऐसी मुहिम है जो महिलाओं को आत्मविश्वासी बनाने के साथ संविधान की सहायक धाराओं से परिचित करवाने का भी काम करती है । इस उदद्देश्य को पूरा करने के लिए समाज की मानसिकता का बदलना बेहद जरूरी है और मानसिकता बदलने का काम साहित्य ही बखूबी कर सकता है । इसलिए मैंने इन सच्चाइयों को साहित्य का रूप दिया । आम जनता के लिए कानूनों को सीधे समझने की बजाए साहित्य के माध्यम से समझना अधिक सरल होता है । उन्होंने जोर देते हुए कहा कि यह पुस्तक केवल महिलाओं के लिए ही नहीं बल्कि सभी भाइयों, पिताओं के लिए पढ़नी उतनी ही ज़रूरी है । उन्होंने निकट भविष्य में पुस्तक का अन्य भाषाओं में अनुवाद और इसकी कहानियों के नाट्य रूपांतरण की दिशा में भी काम करने की योजना बताई ।हाल ही में जेनेवा में आयोजित विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्टीयरिंग कमेटी की बैठक से लौटे मुख्य अतिथि डॉ अरविंद माथुर ने सुरक्षा सखी को समाज के लिए ज़रूरी बातों को सम्वेदना और चेतना के साथ प्रस्तुत करने वाली किताब बताया । हम प्रायः ऐसे अन्याय सुन कर चुप रह जाते हैं पर सुरक्षा सखी ऐसे अन्यायों के विरुद्ध आवाज उठाती है । ये कहानियाँ ऐसा सामाजिक विमर्श है जिसके साथ पूरे समाज का जुड़ना बेहद ज़रूरी है ।
चिकित्सा के क्षेत्र में भी उन्होंने ऐसे ही नवाचार का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रायः चिकित्सा का बजट दवाइयाँ, उपकरण, बिल्डिंग, आदि मदों में वितरित होता है । अब समय आ गया है कि हम मरीज की देखरेख को भी इस मद में सम्मिलित करें । हम भी अस्पतालों को ‘होटल’ नहीं बल्कि ‘होम’ समझ कर वहाँ अपनी सेवाएँ दें, वहाँ की कमियाँ दूर करने में अपना सहयोग दें ।डॉ माथुर ने 2019 में स्थापित ‘केयरगिवर्स आशा सोसायटी’ का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका एप चार भाषाओं में उपलब्ध है तथा विश्व के अड़तीस देशों में डाउनलोड किया जा चुका है। विमर्श कार्यक्रम में साहित्य, सुरक्षा और स्वास्थ्य की त्रिधारा ने सराबोर किया
(सृजना ने 21 हजार रुपए की “सुरक्षा सखी’ पुस्तकें निश्शुल्क वितरित करने की घोषणा की)केयरगिवर्स चाहे पारिवारिक हो चाहे प्रोफेशनल उनके बिना चिकित्सा क्षेत्र अधूरा है ।विमर्श की विशिष्ट अतिथि शिक्षविद, समाजसेवी प्रो आशा परमार ने कहा कि पुस्तकें न केवल बोलती हैं बल्कि बोलना सिखाती भी हैं । सुरक्षा सखी हमें मौन दर्शक बनने से रोकती है । इसकी कहानियाँ न केवल इसके पात्रों को बल्कि पाठकों को भी बोलने के लिए प्रेरित करती हैं। उन्होंने सुरक्षा सखी की लेखिका से पाठकों की ओर से अनेक संभावित प्रश्न भी पूछे।कार्यक्रम अध्यक्ष सुषमा चौहान ने सुरक्षा सखी को वर्तमान समाज की महत्ती आवश्यकता बताते हुए स्वतंत्र भारत की स्वतंत्र महिला बनाने की दिशा में एक साहित्ययिक और रोचक कदम बताया । इस अवसर पर उन्होंने पुस्तक “सुरक्षा सखी” पर लिखी अपनी एक कविता भी प्रस्तुत की । धन्यवाद ज्ञापन डॉ नीना छिब्बर ने और कार्यक्रम का संचालन हरीदास व्यास ने किया ।

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