संघर्ष से शिखर तक,जिस महाविद्यालय में छात्र रहे, उसी जी. के. गोवाणी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के बने प्राचार्य
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भीनमाल-(माणकमल भंडारी)यह केवल एक प्रशासनिक नियुक्ति नहीं, बल्कि संघर्ष, संकल्प, परिश्रम और मातृशक्ति के त्याग की एक ऐसी प्रेरणादायी कहानी है, जो यह सिद्ध करती है कि कठिन परिस्थितियाँ कभी भी बड़े सपनों की राह नहीं रोक सकतीं।
मीडिया प्रभारी माणकमल भंडारी ने बताया कि निकटवर्ती ग्राम बागावास में जन्मे और साधारण किसान परिवार से निकलकर अपनी मेहनत के बल पर शिक्षा के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान बनाने वाले नरेश मेहला को आयुक्तालय कॉलेज शिक्षा, राजस्थान जयपुर के आदेशानुसार जी. के. गोवाणी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय का प्राचार्य नियुक्त किया गया है। साथ ही उन्हें राजकीय महाविद्यालय बागोड़ा एवं राजकीय महाविद्यालय जसवन्तपुरा का नोडल प्राचार्य भी बनाया गया है।इस नियुक्ति की सबसे विशेष बात यह है कि जिस महाविद्यालय में कभी उन्होंने विद्यार्थी के रूप में शिक्षा ग्रहण की, बाद में उसी महाविद्यालय में सहायक आचार्य के रूप में सेवाएँ दीं और अब उसी संस्थान का प्राचार्य बनकर नेतृत्व संभालेंगे। यह उपलब्धि न केवल उनके व्यक्तिगत जीवन की सबसे बड़ी सफलता है, बल्कि पूरे क्षेत्र के विद्यार्थियों और युवाओं के लिए प्रेरणा का विषय बन गई है। नरेश मेहला का बचपन अभावों और संघर्षों के बीच बीता। जब वे छोटे थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया। इसके बाद परिवार की पूरी जिम्मेदारी उनकी माता श्रीमती सोमी देवी के कंधों पर आ गई। तीन बच्चों तथा वृद्ध सास-ससुर के पालन-पोषण की चुनौती के बीच उन्होंने कभी भी अपने बच्चों की शिक्षा से समझौता नहीं किया। खेती, मजदूरी और मनरेगा में कार्य कर उन्होंने परिवार का भरण-पोषण किया तथा कठिन परिस्थितियों में भी अपने बेटे और बेटियों को उच्च शिक्षा दिलाई। कठोर परिश्रम का परिणाम यह रहा कि उन्होंने यूजीसी-नेट जेआरएफ जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद स्कूल व्याख्याता भर्ती-2018 में भूगोल विषय से 22 वीं रैंक प्राप्त कर राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय जोडवाड़ा (जालोर) में अपनी सेवाएँ दीं। इसके पश्चात सहायक आचार्य भर्ती-2020 में भूगोल विषय से राज्य में 8 वीं रैंक प्राप्त कर जी. के. गोवाणी राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में सहायक आचार्य के रूप में नियुक्त हुए। इसी दौरान उन्होंने मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर से पीएचडी का शोधकार्य भी प्रारम्भ किया। शिक्षण कार्य के दौरान नरेश मेहला ने विद्यार्थियों के बीच एक अनुशासित, सरल एवं प्रेरणादायी शिक्षक के रूप में अपनी पहचान बनाई। जहाँ कभी वे स्वयं एक विद्यार्थी थे। यह उपलब्धि इस बात का प्रतीक है कि प्रतिभा और परिश्रम के सामने परिस्थितियाँ अंततः हार मान ही लेती हैं। प्राचार्य पद की जिम्मेदारी मिलने पर नरेश मेहला ने कहा कि यह जिम्मेदारी केवल उनका व्यक्तिगत सम्मान नहीं, बल्कि उनकी माता के त्याग, परिवार के विश्वास, शिक्षकों के मार्गदर्शन और शुभचिंतकों के आशीर्वाद का परिणाम है। उन्होंने कहा कि वे महाविद्यालय में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, अनुशासन, नवाचार तथा विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे और संस्थान को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने का हर संभव प्रयास करेंगे।
उन्होंने युवाओं के लिए संदेश देते हुए कहा कि “जीवन में परिस्थितियाँ कितनी भी विपरीत क्यों न हों, यदि लक्ष्य स्पष्ट हो, आत्मविश्वास अटूट हो और मेहनत ईमानदारी से की जाए, तो सफलता अवश्य मिलती है। संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता, बल्कि वही व्यक्ति के व्यक्तित्व को सबसे अधिक मजबूत बनाता है।” नरेश मेहला की यह उपलब्धि आज पूरे जिले और विशेष रूप से ग्रामीण अंचल के युवाओं के लिए एक प्रेरणा बन गई है। यह कहानी बताती है कि आइसक्रीम बेचने और मजदूरी करते हुए पढ़ाई करने वाला एक साधारण ग्रामीण युवक भी अपनी लगन, मेहनत और शिक्षा के बल पर उसी महाविद्यालय का प्राचार्य बन सकता है। जहाँ कभी वह एक विद्यार्थी के रूप में बैठकर अपने भविष्य के सपने देखा करता था।
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