शिक्षा पर आसन्न गंभीर ख़तरे और अन्यायपूर्ण भेदभाव के ख़िलाफ़ ‘शिक्षा बचाओ संविधान बचाओ मुहिम’ का आग़ाज़
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शैक्षणिक संस्थान किसी भी देश और समाज की बुनियाद होते हैं। स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालयों को किसी भी एक विचारधारा, सरकार, जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र का न होकर सभी का होना होता है। ख़ासकर उच्च शिक्षा में विश्वविद्यालय का ‘विश्व’ इन्हें वैश्विक ज्ञान, विज्ञान, अनुसंधान, विमर्श, संवाद का आज़ाद केंद्र बनाता है। भारत के संविधान की प्रस्तावना के मूल न्याय, समता, बंधुता के मूल्यों पर ही शिक्षा का वजूद निर्भर होना चाहिए। मगर मौजूदा दौर में शिक्षा के केंद्र इन विश्वविद्यालयों और पूरे शिक्षा जगत पर कई तरह के गम्भीर ख़तरे दिखाई दे रहे हैं। जिससे उच्च शिक्षा से जुड़े विद्यार्थी, शोधार्थी, प्रोफ़ेसर सभी चिंतित हैं। इसलिए हम भारत के नागरिक इन ख़तरों की तरफ़ देश का ध्यान आकृष्ट कराना चाहते हैं-
- 1. देश की शिक्षा व्यवस्था पर एक विचारधारा विशेष को थोपा जा रहा है। अलग विचार रखने वाली आवाज़ों का दमन किया जा रहा है। जिससे शिक्षा का स्वायत्त, निष्पक्ष, तटस्थ, समावेशी व संविधान पर आधारित चरित्र नष्ट हो रहा है।

2. विश्वविद्यालयों में प्रोफ़ेसरों की नियुक्ति प्रक्रिया बेहद भ्रष्टाचारी, भेदभावकारी और अपारदर्शी है। जिसके चलते वास्तविक प्रतिभाओं का हनन हो रहा। कम प्रतिभावान लोगों के हाथों विद्यार्थियों का भविष्य संकट में डाला जा रहा है। योग्यता को परखने की प्रक्रिया बिल्कुल यथेच्छित है।अकादमिक रिकॉर्ड का महत्व चयन प्रक्रिया में बिल्कुल अर्थहीन है। इसलिए नियुक्ति प्रक्रिया तत्काल बदली जाए। छात्रों की माँग है कि सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों के लिए एक आयोग बनाकर प्रोफ़ेसर का चयन किया जाए।
3. विश्वविद्यालयों व कॉलेजों के भीतर हर स्तर पर जातिगत, लैंगिक और अन्य कई क़िस्म के शोषण व भेदभाव बदस्तूर जारी हैं, जिसके चलते देश भर के विश्वविद्यालयों से वंचित शोषित जमात के विद्यार्थियों, शोधार्थियों और प्रोफ़ेसरों के साथ अनवरत अन्याय हो रहा है। इंटरव्यू में नंबर से लेकर रिसर्च करने और नौकरी पाने तक में सामाजिक न्याय की संकल्पना के साथ अन्याय किया जा रहा है।
4. सरकार व एक विचारधारा विशेष के प्रभाव में पाठ्यक्रम बर्बाद किए जा रहे हैं, पीएचडी एडमिशन तक में घोर धांधली की जा रही है, विद्यार्थियों की सीटों व फ़ेलोशिप में कटौती हो रही है, फ़ीस बेतहाशा बढ़ाई जा रही है, उच्च शिक्षा का पूरी तरह से बाजार को दिया जा रहा है, जिससे सस्ती और गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक शिक्षा महँगी हो जाएगी।
5. अभी हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय से बेहद प्रतिभाशाली तक़रीबन एक हज़ार प्रतिभावान, अनुभवी व क़ाबिल शिक्षकों को नौकरी से निकाल दिया गया है। ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिसमें देश भर के प्रतिभावान युवाओं के साथ अन्याय करके उन्हें शिक्षा जगत से बेदख़ल किया जा रहा है।
6. शिक्षकों को ठेके पर रखकर विश्वगुरु बनने का ख़्वाब देखा जा रहा है, जो बेहद ख़तरनाक है। छात्र शिक्षक अनुपात के वैश्विक मानक के तहत सभी पदों पर स्थाई नियुक्ति हो।हम, भारत के आम नागरिक, प्रोफ़ेसर्स, शोधार्थी, विद्यार्थी व बुद्धिजीवी उक्त तमाम विषयों को लेकर बेहद चिंतित हैं। आज की प्रेस कॉन्फ़्रेंस के ज़रिए पूरे देश का ध्यान इस बेहद गंभीर चुनौती की तरफ़ लाना चाहते है। देश की सरकार और महामहिम राष्ट्रपति से अपील करते हैं कि तत्काल आप कुछ ठोस क़दम उठाएँ और उच्च शिक्षा को बचाने की हमारी अपील पर ग़ौर करें। महामहिम सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों की कुलाधिपति भी हैं और भारत की प्रथम नागरिक भी।
भारत के हम आम नागरिक आपसे अपील करते हैं कि यदि उच्च शिक्षा किसी सरकार या किसी एक विचारधारा की गिरफ़्त में पूरी तरह चली जाएगी, तो इससे पूरे समाज और देश अपूर्णनीय क्षति होगी। अतः हम, भारत के आम नागरिक आपसे यह विनम्र अपील करते हैं कि आप इस बेहद गंभीर मसले को गंभीरता से लें।आज से हम ‘शिक्षा बचाओ संविधान बचाओ मुहिम’ का आग़ाज़ करते हैं। इस मुहिम के तहत हम देश भर के सभी सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक संगठनों से भी अपील करते हैं कि आप सभी अपने अपने स्तर पर अपने इलाक़े के स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में हो रहे अन्याय के आँकड़े एकत्रित करें,
आम लोगों को जागरूक करें और इसे एक जन-आंदोलन में तब्दील करके स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय बचाने के साथ संविधान बचाने के लिए आगे आएँ
आभार
भारत के नागरिक
‘शिक्षा बचाओ संविधान बचाओ मुहिम’
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