भीनमाल की ऐतिहासिक धोकागैर आज भी लोगों के आकर्षण का केन्द्र है।
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भीनमाल-भीनमाल होली पर्व देशभर में अलग-अलग अंदाज में मनाया जाता है। भीनमाल की ऐतिहासिक धोकागैर आज भी लोगों के आकर्षण का केन्द्र है। धोकागैर होली दहन के अगले बाबैया ढोल पर खेली जाती है। इसकी खासियत यह है कि बाबैया ढोल जैसे ही बजने लगता है, तो युवाओं के कदम गैर में खेलने के लिए थिरकने लगते हैं। होली के दूसरे दिन युवाओं को बाबैया ढोल का इंतजार रहता है, जैसे ही ढोल गैर में पहुंचता है तो युवाओं के साथ बुजुर्ग भी उत्साह व जोश से नृत्य करने लगते हैं।धोकागैर में युवा फाल्गुन के मस्तीभरे गीत गाते हुए लाठी से प्रहार व बचाव का करतब दिखाते हैं। शहर के बड़े चौहटे पर सालों से घोटा गैर खेलने की परंपरा है। धोकागैर को देखने के लिए प्रवास सहित आस-पास गांवों से लोग पहुंचते हैं। हालांकि बदलते परिवेश में धोकागैर भीनमाल, बड़े चौहटे पर चोकागैर का महज 10-15 मिनट तक ही खेली जाती है।कल से शुरू होगा गैर नृत्य होली पर्व पर वैसे तो भीनमाल की धोकागैर प्रसिद्ध है, आमली ग्यारस के साथ ही होली पर्व का शुभारंभ होता है। आमली ग्यारस से बड़े चौहटे पर गैर नृत्य का शुभारंभ होता हैं। बुधवार शाम को बड़ा चौहटा बाबैया ढोल के साथ यहां के बुर्जुग व युवा बड़ा चौहटे से बाबौया ढोल के साथ चण्डीनाथ तक पहुंचते है। महादेव व माताजी की पूजा-अर्चना कर उसके बाद बड़े चौहटे पहुंचते है। रात को 10 बजे से 11 बजे तक गैर का आयोजन होता है, जो धोकागैर के बाद समाप्त है।
गैर नृत्य का आयोजन अनवरत सांस्कृतिक परम्परानुसार होता है और मैले-सा माहौल दिन भर पुरे शहर में रहता है। पूरा खेल इसी ढोल पर आधारित है।600 साल पुरानी की धोकागैर- भीनमाल की धोकागैर करीब 600 साल से ज्यादा पुरानी है। बाबैया ढोल भी 400 साल पुराना है। होली पर्व पर ही यह ढोल बाहर आता है। यहां गैर आमली ग्यारस से शुरू होता है, जो धोकागैर से समाप्त होता है। सालों से चली आ रही परम्परा है। राव हकड्क्षसह ईरानी, शहरवासी वर्तमान में कई बदलाव आए। धोकागैर भीनमाल में सालों से खेली जाती है। बदलते परिवेश के साथ इसमें बदलाव भी आया है। पहले यह घंटेभर तक खेली जाती थी. लेकिन अब 10-15 मिनट तक ही खेली जाती है। गैर नृत्य का शुभारंभ बुधवार शाम से होगा। बाबुलाल माली, शहरवासी।होली पर बाहर निकलता है बाबैया ढोल- मान्यताओं के अनुसार सैकड़ों साल पुराने इस ढोल को वर्षों पहले ठाकुरों ने मीर समाज को सौंपा था। यह ढोल को सिर्फ होली पर्व पर ही बाहर निकाला जाता है।
बाकी के दिनों में यह ढोल को बाहर नहीं निकाला जाता है। रियासती के समय सेना के लिए लड़ाकों की आवश्यकता के मद्देनजर शुरू हुई बताई। इससे लटठ का प्रहार व बचाव में पारंगत लोगों को सेना के लिए चुना जाता था। धौकागैर 600 वर्ष पूर्व शुरुआत हुई बताते है, और शहर का हर वर्ग इसमें शामिल होता था। और ढोल भी 400 साल पुराना बताया। 10-15 तक खेली जाती है धोकागैर- होली के अगले दिन शहर के बड़े चौहटे पर शाम को 5.30 घोकागैर खेली जाती है। धोकागैर चण्डीनाथ महादेव मंदिर से शाम 5 बजे बाबैया ढोल के साथ रवाना होकर खारीरोड, लक्ष्मीमाता मंदिर गणेश चौक होते हुए 5.30 बड़े चौहटे पर पहुंचती है। वहां पर 10-15 मिनट धोकागैर खेलने के बाद समापन होता है। यहां धुळण्डी पर्व होली दहन के दूसरे दिन खेली जाती है।(1311)
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