मुख्य भाषण देते हुए पाली एवं संस्कृत के प्रख्यात विद्वान और राष्ट्रपति सम्मान पत्र प्राप्तकर्ता डॉ. उमाशंकर व्यास ने अभिधम्म के विकास की व्याख्या करते हुए इसे “धर्म का विशेष प्रकाश” या “विशेष ज्ञानोदय” के रूप में वर्णित किया।इसमें द्रिकुंग काग्यू वंश के परम पूज्य तृतीय खेंचेन रिनपोछे मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उन्होंने कहा कि अभिधम्म की प्रासंगिकता इसके दैनिक जीवन में उपयोग में निहित है जो अज्ञानता, आसक्ति और क्रोध के लिए एक उपचार के रूप में कार्य करता है।
श्री अभिजीत हलदर, महाप्रबंधक, आईबीसी, ने अभिधम्म की समकालीन प्रासंगिकता एवं आधुनिक समाज में मानसिक और शारीरिक कल्याण को बढ़ावा देने में उसकी भूमिका पर बल दिया।इस कार्यक्रम में सैद्धांतिक आधार, अंतर्विषयक दृष्टिकोण, तुलनात्मक अध्ययन एवं समकालीन प्रासंगिकता पर विशेष एवं तकनीकी सत्र आयोजित किए गए।धारवाड़, कर्नाटक के श्री विनोद कुमार द्वारा तैयार किए गए बौद्ध टिकटों की एक अनूठी प्रदर्शनी आयोजित की गई, जिसमें 90 देशों के 2,500 से ज्यादा टिकट शामिल थे। आईबीसी ने दो थीम आधारित प्रदर्शनी भी आयोजित कीं जिसमें पहली “शरीर एवं मन पर बुद्ध धम्म” और दूसरी प्रदर्शनी में पिपरहवा अवशेषों पर प्रकाश गया गया, जो बुद्ध की स्थायी आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक हैं।
इसमें दो फिल्में का प्रदर्शन किया गया, “एशिया में बुद्ध धम्म का प्रसार” और “कुशक बकुला रिनपोछे – एक असाधारण भिक्षु की असाधारण कहानी”, जिनका निर्देशन ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के डॉ. हिंडोल सेनगुप्ता ने किया था।
अभिधम्म दिवस में उस अवसर को याद किया जाता है जब बुद्ध ने अपनी माता महामाया के नेतृत्व में तवतींशा स्वर्ग के देवताओं को अभिधम्म का उपदेश दिया था तथा बाद में इसे अपने शिष्य अरहंत सारिपुत्त के साथ साझा किया था।उल्लेखनीय है कि भारत सरकार ने पाली को शास्त्रीय भाषा घोषित किया है तथा अभिधम्म पिटक सहित थेरवाद बौद्ध ग्रंथों की प्रामाणिक भाषा के रूप में इसके महत्व को मान्यता दी है।