“विश्व टीबी दिवस” के अवसर पर, भारत ने अपनी तरह का पहला वैश्विक क्लिनिकल अध्ययन शुरू किया
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नई दिल्ली-भारत ने आज दुनिया के पहले और ऐतिहासिक क्लिनिकल अध्ययन की घोषणा की। इस अध्ययन में पहली बार वैश्विक स्तर पर, स्टैंडर्ड एंटी-ट्यूबरकुलोसिस (एटीटी) उपचार के सहायक के तौर पर आयुर्वेद का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाएगा। विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और पीएमओ, कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन, परमाणु ऊर्जा विभाग तथा अंतरिक्ष विभाग में राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने इसे आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों का एक अनूठा संगम बताया, जिसके ज़रिए टीबी की समस्या का समाधान समग्र और रोगी-केंद्रित तरीके से किया जाएगा।विश्व टीबी दिवस के मौके पर बोलते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत में वैश्विक टीबी के बोझ का लगभग 25% हिस्सा है। भारत में 2024 में टीबी के मामलों में काफ़ी कमी दर्ज की गई है। अब प्रति 100,000 आबादी पर लगभग 187 मामले सामने आ रहे हैं, जो 2015 के मुक़ाबले 21% की कमी को दिखाता है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, “टीबी के मामलों में यह कमी भारत के समर्पित और नए प्रयासों का नतीजा है। हम सब मिलकर एक टीबी-मुक्त भारत बनाने की दिशा में काम करते रहेंगे।” उन्होंने आगे कहा कि यह देश के सही दिशा में लगातार आगे बढ़ने का संकेत है।डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत ने राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम के तहत शीघ्र निदान, दवाओं के प्रति संवेदनशीलता की सार्वभौमिक जांच, डिजिटल अनुपालन तकनीकों और रोगी-केंद्रित देखभाल को बेहतर बनाते हुए, टीबी के उन्मूलन की दिशा में एक महत्वाकांक्षी और तेजी से आगे बढ़ने वाला मार्ग अपनाया है।तपेदिक के ऐतिहासिक सफर को याद करते हुए मंत्री ने कहा कि एक समय ऐसा भी था जब तपेदिक का कोई प्रभावी इलाज नहीं था और मरीज़ों को सैनिटोरियम में अलग-थलग रखा जाता था, जहाँ उन्हें अक्सर डर और सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ता था। उन्होंने कहा कि तपेदिक सामाजिक चर्चाओं, साहित्य और फिल्मों में गहराई तक अपनी जगह बना चुका था, जिसका मुख्य कारण इसके इलाज का उपलब्ध न होना था। तपेदिक-रोधी दवाओं के आने और चिकित्सा विज्ञान के लगातार विकसित होने के साथ, यह बीमारी धीरे-धीरे इलाज योग्य बन गई, जिसने सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव ला दिया।मंत्री महोदय ने कहा कि इस प्रगति के बावजूद, अभी भी टीबी एक जटिल चुनौति है। मरीज़ों को अक्सर ठीक हो जाने के बाद भी, इलाज से जुड़ी विषाक्तता, कुपोषण, रोग-प्रतिरोधक क्षमता में कमी और फेफड़ों की दीर्घकालिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उन्होंने आगे कहा कि दवा-प्रतिरोधी टीबी का बढ़ता बोझ स्थिति को और भी जटिल बना देता है, जिसके लिए नए और बहु-आयामी समाधानों की आवश्यकता है।डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि तपेदिक को अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता, क्योंकि संक्रामक और गैर-संक्रामक बीमारियाँ अक्सर एक साथ पाई जाती हैं और एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। उन्होंने टीबी और मधुमेह जैसी बीमारियों के बीच आपसी संबंध की ओर इशारा किया, जहाँ एक बीमारी दूसरी को और भी गंभीर बना सकती है; ऐसे में, बीमारी के प्रभावी प्रबंधन के लिए एकीकृत दृष्टिकोण अपनाना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए मंत्री ने कहा कि विभाग टीबी अनुसंधान के क्षेत्र में कई तरह की पहल कर रहा है, जिनमें होस्ट-पैथोजन जीव विज्ञान, दवाओं की खोज, वैक्सीन का विकास और जीनोमिक निगरानी शामिल हैं। उन्होंने ‘रीपोर्ट इंडिया’ कार्यक्रम का ज़िक्र किया, जो टीबी अनुसंधान के सबसे बड़े समूहों में से एक है। इस कार्यक्रम के तहत 4,500 से ज़्यादा टीबी मरीज़ों और 5,000 से ज़्यादा उनके पारिवारिक संपर्कों को शामिल किया गया है। इससे ऐसे प्रमाण मिले हैं जिन्होंने वैश्विक नीतिगत ढांचों में योगदान दिया है, जिनमें पोषण और टीबी से जुड़े डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देश भी शामिल हैं।मंत्री महोदय ने टीबी उन्मूलन के लिए डेटा-आधारित अनुसंधान कार्यक्रम का भी ज़िक्र किया, जिसके तहत कई पहलें शुरू की गई हैं, जिनमें ‘इंडियन ट्यूबरकुलोसिस जीनोमिक सर्विलांस कंसोर्टियम’ भी शामिल है। “उन्होंने कहा कि इस पहल के तहत माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस के 32,000 से अधिक नैदानिक स्ट्रेन का अनुक्रमण किया जा रहा है, जिससे दवा की खोज, निदान और दवा-प्रतिरोधी टीबी की रोकथाम में सहायता के लिए एक मूल्यवान राष्ट्रीय भंडार तैयार किया जा रहा है।डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सफल उपचार के बाद भी, कई टीबी रोगियों में कमजोरी, वजन कम होना और जीवन की गुणवत्ता में गिरावट का अनुभव होता रहता है, जो सहायक और होस्ट-निर्देशित उपचारों की आवश्यकता को रेखांकित करता है। मंत्री ने कहा कि आयुर्वेद की भारत की समृद्ध विरासत ऐसे उपायों के लिए अद्वितीय अवसर प्रदान करती है, विशेष रूप से पोषण, रोग-प्रतिरोधक क्षमता और समग्र स्वास्थ्य लाभ में सुधार के लिए।जैव प्रौद्योगिकी विभाग और आयुष मंत्रालय के बीच होने वाले संयुक्त क्लिनिकल अध्ययन की घोषणा करते हुए उन्होंने कहा कि यह पहल न केवल भारत में, बल्कि पूरे विश्व में अपनी तरह की पहली पहल है, क्योंकि इसका उद्देश्य कठोर वैज्ञानिक मूल्यांकन के माध्यम से पारंपरिक चिकित्सा को प्रमाणित करना है। उन्होंने कहा कि यह अध्ययन “संपूर्ण-विज्ञान” की भावना को दर्शाता है, जिसमें जैव प्रौद्योगिकी और आयुर्वेद को एकीकृत किया गया है; “संपूर्ण विज्ञान” की भावना को दर्शाता है, जिसमें विभिन्न मंत्रालयों के बीच सहयोग स्थापित किया गया है और “संपूर्ण-राष्ट्र” की भावना को दर्शाता है, जिसमें देश भर के प्रमुख संस्थानों से 1,200 से अधिक रोगियों की भागीदारी सुनिश्चित की गई है।डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि टीबी एक इतनी गंभीर चुनौती है कि इसका सामना अकेले सरकार नहीं कर सकती, और इसे केवल स्वास्थ्य सेवा प्रणाली या परिवारों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। उन्होंने टीबी से जुड़े सामाजिक कलंक को दूर करने के लिए समुदायों, नागरिक समाज संगठनों और जागरूकता अभियानों को शामिल करते हुए एक सामूहिक सामाजिक प्रयास का आह्वान किया। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि सामाजिक सोच के कारण मरीज़ अक्सर अपने लक्षणों को छिपाते हैं, जिससे बीमारी की पहचान और इलाज में देरी होती है। मंत्री ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि चिकित्सीय इलाज के साथ-साथ, पोषण संबंधी सुधार, जीवनशैली में सहयोग और सामुदायिक स्तर पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए, क्योंकि ये कारक पूरी तरह और लंबे समय तक ठीक होने को सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाते हैं।इस कार्यक्रम के साथ ही विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग और आयुष मंत्रालय के बीच एक संयुक्त कार्यक्रम की शुरुआत हुई। इस कार्यक्रम में आयुष मंत्रालय के केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री प्रतापराव जाधव; जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव डॉ. राजेश एस. गोखले; आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा; केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के महानिदेशक प्रो. वैद्य रबिनारायण आचार्य; ‘ब्रिक्स’ -राष्ट्रीय प्रतिरक्षा विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. देबाशीष मोहंती; तथा देश भर के प्रमुख संस्थानों के वरिष्ठ वैज्ञानिक, शोधकर्ता और प्रतिनिधि शामिल हुए।अध्ययन का अवलोकन करते हुए, सीसीआरएएस के महानिदेशक, प्रो. वैद्य रबीनारायण आचार्य ने कहा कि यह पहल 25 मई 2022 को आयुष मंत्रालय और जैव प्रौद्योगिकी विभाग के बीच हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन के तहत विकसित की गई है और परामर्श, प्रोटोकॉल को अंतिम रूप देने और अनुमोदन के माध्यम से आगे बढ़ी है। अध्ययन में आठ संस्थानों में 1,250 नए पहचाने किए गए टीबी रोगियों को नामांकित किया जाएगा और शरीर के वजन, पोषण संबंधी परिणामों, रोग की प्रगति, जीवन की गुणवत्ता, सुरक्षा और सहनशीलता पर ध्यान केंद्रित करते हुए मानक उपचार के सहायक के रूप में आयुर्वेद का मूल्यांकन किया जाएगा। यह मूल्यांकन मरीज के शरीर का वजन, पोषण संबंधी परिणाम, बीमारी के बढ़ने, जीवन की गुणवत्ता, सुरक्षा और सहनशीलता के आधार पर किये जायेंगे।ब्रिक-राष्ट्रीय प्रतिरक्षा विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. देबाशीष मोहंती ने कहा कि यह अध्ययन टीबी से संबंधित कैशेक्सिया की एक प्रतिरक्षा-चयापचय स्थिति के रूप में भी जांच करेगा। इसमें शरीर की संरचना, प्रतिरक्षा प्रणाली और ऊर्जा चयापचय में होने वाले परिवर्तनों को समझने के लिए डेक्सा, एमआरआई, इम्यून प्रोफाइलिंग, मेटाबोलोमिक्स और सिंगल-सेल आरएनए सीक्वेंसिंग जैसे उन्नत उपकरणों का उपयोग किया जाएगा। साथ ही, यह भी आकलन किया जाएगा कि एकीकृत हस्तक्षेप ठीक होने और दीर्घकालिक परिणामों को कैसे प्रभावित करते हैं।आयुष मंत्रालय के केंद्रीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री प्रतापराव जाधव ने कहा कि यह पहल स्वास्थ्य सेवा के एक व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिसमें संक्रमण के इलाज से आगे बढ़कर आयुर्वेद को आधुनिक चिकित्सा के साथ एकीकृत करके पूर्ण स्वस्थ होने, बेहतर पोषण और जीवन की गुणवत्ता में सुधार सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव, डॉ. राजेश एस. गोखले ने कहा कि यह कार्यक्रम जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा टीबी अनुसंधान के क्षेत्र में किए गए व्यापक कार्यों पर आधारित है, जिसमें नैदानिक परीक्षण, टीका विकास, और कोहोर्ट अध्ययन शामिल हैं। उन्होंने आगे कहा कि यह एकीकृत और रोगी-केंद्रित स्वास्थ्य सेवा दृष्टिकोण के लिए साक्ष्य उत्पन्न करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।कार्यक्रम के अंत में, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि टीबी के खिलाफ लड़ाई के लिए हर स्तर पर नवाचार, एकीकरण और सामूहिक जिम्मेदारी की आवश्यकता है। उन्होंने आगे कहा कि इस तरह की पहल भारत को टीबी-मुक्त राष्ट्र बनाने की दिशा में उसकी यात्रा को गति प्रदान करेंगी और साथ ही पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ने का एक वैश्विक उदाहरण भी पेश करेंगी।
केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह मंगलवार को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में “विश्व टीबी दिवस” कार्यक्रम के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए।
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