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हल्दीघाटी केवल युद्ध नहीं, जन-जन के स्वाभिमान का संग्राम था -डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़

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उदयपुर-उदयपुर जिले के रामा ग्राम में प्रातःस्मरणीय वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप एवं उनके अमर सहयोगी शूरवीर राणा पूंजा की नवनिर्मित प्रतिमाओं का अनावरण समारोह अत्यंत श्रद्धा, उत्साह एवं भव्यता के साथ आयोजित किया गया। समारोह में बड़ी संख्या में ग्रामीणजन, समाज प्रतिनिधि एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।समारोह के मुख्य अतिथि श्रीश्री 108 अवधेश चैतन्य ब्रह्मचारी महाराज, सूरजकुंड एवं मेवाड़ के 77वें श्री एकलिंग दीवान डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ थे। वहीं विशिष्ट अतिथियों में माननीय कैबिनेट मंत्री बाबूलाल खराड़ी, माननीय सांसद उदयपुर मन्नालाल रावत,गोगुन्दा विधायक प्रतापलाल गमेती, भाजपा जिलाध्यक्ष शहर जिला उदयपुर गजपाल सिंह राठौड़ एवं भाजपा जिलाध्यक्ष देहात उदयपुर पुष्कर तेली सहित

अनेक जनप्रतिनिधि एवं गणमान्य अतिथि समारोह में सम्मिलित हुए।

इस अवसर पर डॉ. लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ ने महाराणा प्रताप के अद्वितीय स्वाभिमान, राष्ट्रभक्ति एवं स्वतंत्रता संग्राम के संघर्षों को स्मरण करते हुए उन्हें एवं उनके अमर सहयोगियों को नमन किया। उन्होंने हल्दीघाटी युद्ध को जन-जन का युद्ध बताते हुए कहा कि मेवाड़ की 36 कोमों ने एकजुट होकर अधर्म के विरुद्ध संघर्ष किया था तथा अपने प्राणों की आहुतियां दी।उन्होंने राणा पूंजा के योगदान का विशेष उल्लेख करते हुए उन्हें महाराणा प्रताप के विश्वासपात्र एवं अमर सहयोगियों में अग्रणी बताया। उन्होंने कहा कि युद्धकाल में जब-जब मुगल सेना अरावली की पहाड़ियों में महाराणा प्रताप के समीप पहुंचने का प्रयास करती थी, तब राणा पूंजा एवं उनके वीर सैनिक चट्टान की भांति उनके मार्ग में खड़े मिलते थे। यही कारण है कि मेवाड़ के इतिहास में राणा पूंजा एवं उनके सैनिकों का स्थान सदैव सर्वोच्च रहा है। मेवाड़ के राज्य चिह्न में राजपूत सैनिक के साथ ही भील सैनिक को सम्मानपूर्वक स्थान प्रदान किया गया तथा उसके नीचे अंकित वाक्य ‘जो दृढ़ राखे धर्म को तिही राखे करतार’ उनके त्याग एवं धर्मनिष्ठा का प्रतीक है।डॉ. मेवाड़ ने महाराणा प्रताप के प्रिय अश्व चेतक एवं गज रामप्रसाद की वीरता और स्वामिभक्ति का भी स्मरण किया। उन्होंने कहा कि चेतक ने युद्धभूमि में अपने स्वामी की रक्षा करते हुए बलिदान दिया, वहीं गज रामप्रसाद ने स्वामी वियोग में अपने प्राण त्याग दिए। इसी कारण लेखकों ने इतिहास में मनुष्यों के साथ-साथ पशुओं के बलिदानों को भी सम्मान जनक स्थान दिया।समारोह में उपस्थित विशाल जनसमूह एवं ग्रामीणों की सक्रिय सहभागिता की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि ग्रामवासियों की एकजुटता एवं सहभागिता ही ऐसे सामूहिक आयोजनों की सफलता का मूल आधार होती है।

अंत में उन्होंने समस्त ग्रामवासियों एवं आयोजन समिति को शुभकामनाएं देते हुए मुख्य अतिथि श्रीश्री 108 अवधेश चैतन्य ब्रह्मचारी महाराज का अभिनंदन किया तथा रामा ग्राम की सुख, समृद्धि, शांति एवं निरंतर प्रगति की मंगलकामना की।

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