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जोधपुर के 568 वें  स्थापना दिवस 12 मई 2026 पर विशेष आलेख

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जोधपुर के संस्थापक राव जोधा जी  वीर योद्धादूर दृष्टि सोच, रणनीतिकार व कुशल कूटनीतिज्ञ थे।                            जोधपुर-मारवाड़ के इतिहास में जोधपुर के संस्थापक  राव जोधा जी  एक वीर योद्धा, रणनीतिकार, दूर दृष्टि सोच, कुशल कूटनीतिज्ञ व धैर्यवान के रूप में स्मरण किए जाते हैं।राव जोधा जी  न केवल  यौद्धा थे  बल्कि सामाजिक, राजनीतिक परिस्थितियों को समझने की दूर दृष्टि रखने  वाले शासक थे। उन्होंने मध्ययुगीन प्रतिरक्षा प्रणाली और सामरिक दृष्टि से मंडोर को राजधानी के रूप में असुरक्षित माना और चिड़ियानाथ जी की टूक पर 12 मई 1459 को एक सुदृढ किले का शिलान्यास किया  जो महरानगढ़ दुर्ग के नाम से जाना जाता है व  जोधपुर को नई राजधानी बनाया व  जोधपुर शहर स्थापित किया।

राव जोधा जी से ही  जोधपुर की ऐतिहासिक शौर्य यात्रा प्रारंभ होती है।                                                                मारवाड़ के शासक  राव रणमल के पुत्र राव जोधा का जन्म 28 मार्च, 1415 भादवा  बदी 8, विक्रम संवत 1472 में हुआ। राव जोधा जोधपुर के प्रथम प्रतापी शासक थे। राव जोधा का जीवन कठिनाइयां, चुनौतियों और संघर्ष की अनूठी गाथा है। राव जोधा ने मारवाड़ में सुदृढ  प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की जिसके कारण उनके वंशज निरंतर शासन  करते रहे। राव जोधा से ही जोधपुर की ऐतिहासिक शौर्य यात्रा  प्रारंभ होती है। राव जोधा  ने युद्ध-कौशल व कूटनीति,  राजनीति अपने पिता राव रणमल से सीखी थी। राव रणमल  अपने पिता राव चुंडा के देहांत के बाद 1423 ईस्वी में मेवाड़ महाराणा लाखा की सेवा में मेवाड़ चले गए, उन्होंने अपनी बहन हंसा बाई का विवाह महाराणा लाखा के साथ कर देने के बाद  मेवाड़ की राजनीति में राव रणमल का महत्व बढ़ गया। महाराणा लाखा की मृत्यु के बाद अल्प वयस्क पुत्र  मोकल गद्दी पर बैठे तथा मेवाड़ राज्य का सारा प्रबंध राव रणमल देखने लगे। महाराणा मोकल की हत्या के बाद अल्प वयस्क कुंभा मेवाड़ की गद्दी पर आसीन हुए। राव रणमल के बढ़ते सैन्य  व राजनीतिक प्रभाव से मेवाड़ में  दरबारी षड्यंत्र में चित्तौड़ दुर्ग में 1428 में राव रणमल की हत्या कर दी गई। इन विषम परिस्थितियों में राव जोधा अपने सात सौ विश्वस्त  साथियों के साथ मेवाड़ से मारवाड़ के लिए रवाना हो गए। रावत चूंड़ा के नेतृत्व में मेवाड़ की सेना ने राव जोधा का पीछा किया। कपासन के पास पहली मुठभेड़ में भीषण संघर्ष में राव जोधा के 200 सहयोगी मारे गए इसके बाद सोमेश्वर के घाटे तक पहुंचते पहुंचते चितरोड़ी, सतखंबा कनवज व केलवा में भी दोनों में संघर्ष हुआ। सोमेश्वर पहुंचने तक लड़ते लड़ते राव जोधा के ढाई सौ योद्धा ही बचे। स्वामी भक्त राठौड़ योद्धाओं ने राव जोधा को सकुशल सुरक्षित मंडोर पहुंचने के लिए सात योद्धाओं के साथ रवाना किया। राव जोधा तो सकुशल पहुंच गए लेकिन मंडोर भी सुरक्षित नहीं होने से जांगल की तरफ निकल गए, जहां  काहुनी गांव को अपना ठिकाना बनाया।

राव जोधा ने लगातार 15 वर्षों तक संघर्ष कर मंडोर पर पुनः आधिपत्य स्थापित किया

चितौड़ की सेना ने सोमेश्वर के बाद मण्डोर पर अधिकार करके चौकडी, मेडता, सोजत में भी अपनी सैन्य चौकियां स्थापित कर दी। काहुनी में राव  जोधा को  ढूंढने पर  वह जांगल में चले गये। काफी संघर्ष के दौर से गुजरते हुए राव जोधा इधर-उधर अपने ठिकाने बदलते रहे। पिता राव रणमल की हत्या के समय मारवाड की शासन व्यवस्था अस्त-व्यस्त थी। जैतारण पर सिंधल राठौड़ो  का अधिकार, सिवाना पर जैतमालोत शासन, खेड़ पर राव  मल्लिनाथ  के वंशजों व  नागौर पर खानजादा  के वंश का अधिकार था। इस पर राव जोधा ने धीरे-धीरे अपनी सैन्य ताकत बढाई। गागरोन के  शासक चाचिंग देव चौहान की पुत्री  बरजांग के विवाह से उनकी मदद भी मिली।  सेतरावा रावत लूणा  ने भी सहयोग किया। राव जोधा का आत्मविश्वास बढ़ता गया और सही मौका देखकर मंडोर पर आक्रमण कर पुनः अधिकार कर लिया। साथ ही अन्य मेवाड़ी कब्जे की चौकियां चौकड़ी, कोसाना पर कब्जा किया। मेवाड़ी सेना  को भगाकर सोजत के पास धनला में परास्त किया। लगातार 15 वर्षों के संघर्ष के बाद राव जोधा ने मारवाड़ को मेवाड़ से मुक्त कराकर 1453 में मंडोर पर पुन: आधिपत्य स्थापित किया। राव जोधा  चित्तौड़ के महाराणा कुंभा से अपने पिता की हत्या का बदला लेना चाहते थे। महाराणा  कुंभा भी अपने मेवाड़ी सामंतों के मारे जाने से अत्यंत क्रोध में थे। मेवाड़ की ओर से आक्रमण की सूचना मिलने पर  राव जोधा  अपने राठौड़ वीरों को साथ लेकर महाराणा  की सेना  से मुकाबला के लिए पाली से रवाना हुए। राव जोधा के पास  अश्व कम थे इसलिए राठौड़ वीर बैलगाड़ियों में आरूढ   होकर चले जिन्हें देखकर मेवाड़ी सेना  में आतंक छा गया और मेवाड़ी सेना  बिना युद्ध किए ही लौट गई। राव जोधा ने उचित अवसर का लाभ उठाते हुए चित्तौड़गढ़  दुर्ग को जा घेरा  और दुर्ग के द्वार जला दिए, जिस  महल में  उनके पिता राव रणमल रहते थे वहां जाकर मस्तक झुकाया।

1453 में मंडोर के किले में राव जोधा का हुआ राज्याभिषेक

1453 में मण्डोर के किले में राव जोधा जी का शास्त्रानुसार राज्याभिषेक हुआ। राव जोधा ने अपने पुत्र दूदा की भेज कर जैतारण पर कब्जा करवाया। छापर द्रोणमुख पर आधिपत्य किया जो महत्वपूर्ण था। राव जोधा के अनुज कांधल लोदी  वंश के प्रमुख सामन्त सारंग खाँ से युद्ध में मारे गये। राव जोधा ने सारंग खां को  मार कर बदला लिया। इसके बाद मारवाड़ की सीमाएँ हिसार तक जा पहुँची। उत्तरी भारत के प्रमुख राजाओं में राव जोधा की गिनती होने लगी। राव जोधा के पुत्र बीका द्वारा बीकानेर की स्थापना व राव दूदा व  वरसिंग द्वारा मेड़ता की स्थापना प्रमुख घटनाएँ रही। मण्डोर के बाद राव जोधा ने मेडता, फलोदी, पोकरण, सिवाना, पाली, सोजत, नाडोल, जैतारण, शिव, डीडवाना, गोडवाड़ का कुछ हिस्सा व नागौर पर अधिकार कर लिया। उत्तरी भारत की ओर विजय अभियान को पठानों ने रोक दिया।

सुदृढ साम्राज्य विस्तार

राव जोधा  जी साहसी, वीर, राजनीतिक दृष्टि व कूटनीतिज्ञ थे। अपनी 73 वर्ष की अवस्था में 23 वर्ष तक पिता  की सेवा में रहे,15 वर्ष तक इन्हें विकट परिस्थितियों का सामना करना पड़ा और उसके बाद 35 वर्ष तक  अपने राज्य की उन्नति में लग रहे। उन्होंने सुदृढ़ साम्राज्य विस्तार किया। राज्य की सीमाओं को सुरक्षित किया। उस समय उनके अधिकार में मंडोर, जोधपुर, मेड़ता, फलोदी, पोकरण, महेवा, भाद्राजून, सोजत, गोड्वाड़ का कुछ भाग, जैतारण, शिव, सिवाना, सांभर, अजमेर और नागौर प्रांत का बहुत सा भाग था। बीकानेर और  छापर-द्रोणापुर उनके पुत्रों के अधिकार में थे। उनके राज्य की पश्चिमी सीमा जैसलमेर तक, दक्षिणी सीमा अरावली तक और उत्तरी सीमा हिसार तक  पहुंच गई थी।

मेवाड़ से संबंध सुधारने के लिए कूटनीति

कुशल कूटनीति व राजनीति  के तहत मेवाड़ से रिश्ते सुधारने की नीति के तहत महाराणा  कुम्भा से राजनीतिक सहयोग स्थापित करने के लिए अपनी पुत्री श्रृंगारदे का विवाह राणा कुम्भा के पुत्र रणमल के साथ किया। मारवाड़ मेवाड़ सम्बन्ध पुनः बेहतर बने। इसके बाद सोजत को सीमा निर्धारण का बिन्दु बनाया। राणा कुम्भा के उत्तराधिकारी उदा ने उन्हें अजमेर व सांभर पुनः सौंप दिए ताकि पठानों के विरुद्ध संघर्ष में राव जोधा का सहयोग मिल सके।

राव जोधा जी के पुत्र                                                     राव जोधा के  पुत्र,  सातल, सूजा, नीबा, दूदा, वरसिंग, बीका, बीदा, जोगा, शिवराज, करमसी, रायपाल, भारमल, जसवन्त, चांदराव, वणवीर, कूंपा, व सावंतसी, रूप सिंह, लक्ष्मण, जगमाल, गोपाल दास  थे। उन्होंने मारवाड़ का विशाल सामाज्य सुरक्षा व व्यवस्था के लिए अपने स्वजनों को सौंपा। उन्होंने सोजत अपने बड़े भाई को,  मेड़ता पुत्र वीरसिंह, छापर द्रोणमुख  अपने पुत्र बीका को, बीकाजी ने जांगल प्रदेश को जीतकर 1488 में बीकानेर में किले की स्थापना कर बीकानेर शहर बसाया। मध्ययुगीन राजस्थान में राव जोधा का उत्कर्ष उनकी उपलब्धियों का प्रमाण है। 50 वर्ष के कालखण्ड तक शासन करने के बाद वि.सं. 1545 की वैशाख सुदी पांचम, 16 अप्रैल, 1488 ई. को 73 वर्ष की उम्र में स्वर्गवास हुआ।

राव जोधा जी  द्वारा स्थापित महरानगढ़ दुर्ग अपनी भव्यता लिए हुए है

राव जोधा द्वारा स्थापित महरानगढ़ दुर्ग वर्षों से अपने अंदर इतिहास को समाये हुए है। आज भी बेहतरीन किलो में इसका शुमार होता है । महाराजा गजसिंह जी के मुख्य संरक्षण में महरानगढ़ दुर्ग में महरानगढ म्युजियम ट्रस्ट के माध्यम से इतिहास, कला, संस्कृति , हेरिटेज व पर्यटन को बढ़ावा देने का उल्लेखनीय कार्य निरंतर हो रहा है।

 

 

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