श्रीमती पटेल ने कहा कि कार्यक्रम का विस्तार चरणबद्ध तरीके से किया गया है। शुरुआत में, जिला स्वास्थ्य केंद्रों में सरल मामलों के लिए उपचार सेवाओं को मजबूत किया गया, जबकि चुनिंदा संस्थानों को जटिल मामलों के लिए रेफरल सेवाएं प्रदान करने हेतु सशक्त बनाया गया। इसके बाद, जांच और उपचार सेवाओं का विस्तार देश भर में फैले 18 लाख से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के नेटवर्क तक किया गया, जिससे प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल स्तर पर हेपेटाइटिस सेवाओं की पहुंच का विस्तार हुआ।
निवारक उपायों पर प्रकाश डालते हुए, श्रीमती पटेल ने कहा कि “वर्ष 2011 में सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम के तहत शुरू किए गए हेपेटाइटिस बी टीके ने 92 प्रतिशत से अधिक जन्म के समय खुराक कवरेज हासिल कर लिया है।” उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि “वर्तमान में लगभग 65 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं की हेपेटाइटिस बी के लिए जांच की जा रही है, लेकिन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को शत-प्रतिशत जांच की दिशा में काम करना चाहिए ताकि सभी पात्र नवजात शिशुओं को हेपेटाइटिस बी की जन्म के समय खुराक समय पर दी जा सके और हेपेटाइटिस बी पॉजिटिव माताओं के नवजात शिशुओं को 24 घंटों के भीतर हेपेटाइटिस बी इम्युनोग्लोबुलिन (एचबीआईजी) दिया जा सके।”
श्रीमती पटेल ने पेशा आधारित संक्रमण को रोकने के लिए स्वास्थ्यकर्मियों के टीकाकरण के महत्व पर भी बल दिया और संवेदनशील समूहों को दीर्घकालिक यकृत रोग और यकृत कैंसर से बचाने के लिए अत्यधिक जोखिम वाली आबादी के बीच लक्षित क्रियाकलापों का आह्वान किया। हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी को “मूक हत्यारा” बताते हुए, उन्होंने जन जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया और राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आग्रह किया कि वे समुदायों को शिक्षित करें कि सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में परीक्षण और उपचार सेवाएं उपलब्ध हैं।श्रीमती पटेल ने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि “स्वास्थ्य एक साझा लक्ष्य है”, और “भारत सरकार, राज्य सरकारों और सभी हितधारकों को 2030 तक वायरल हेपेटाइटिस को सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिमों को समाप्त करने के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए नए सिरे से प्रतिबद्धता के साथ मिलकर काम करना जारी रखना चाहिए।” देश के सामूहिक प्रयासों पर विश्वास व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि “निरंतर और गहन प्रयासों से हेपेटाइटिस-मुक्त भारत के सपने को साकार करने में मदद मिलेगी।” इस अवसर पर, श्रीमती पटेल ने सूचना, शिक्षा और संवाद (आईईसी) सामग्री भी जारी की, जिसमें हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी पर पोस्टर शामिल हैं, जो संक्रमण के तरीकों और राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस नियंत्रण कार्यक्रम (एनवीएचसीपी) के तहत उपलब्ध सेवाओं को उजागर करते हैं, ताकि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इनका प्रसार किया जा सके।
सभा को संबोधित करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव श्रीमती पुण्य सलीला श्रीवास्तव ने राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस नियंत्रण कार्यक्रम के तहत हासिल की गई महत्वपूर्ण प्रगति पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इस कार्यक्रम के तहत 21 करोड़ से अधिक लाभार्थियों की जांच की जा चुकी है, जबकि 6 लाख से अधिक मरीजों को मुफ्त उपचार मिल चुका है।
केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव ने कहा, “कार्यक्रम ने प्रत्येक जिले में एक उपचार केंद्र स्थापित करने के अपने लक्ष्य को पार कर लिया है। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के सहयोग से, देश में अब 1,153 उपचार केंद्र हैं, जिनमें उन्नत देखभाल प्रदान करने वाले 70 से अधिक विशेष उपचार केंद्र शामिल हैं।” उन्होंने यह भी कहा, “ये उपलब्धियां सरकार, मंत्रालय और समाज के समग्र दृष्टिकोण के माध्यम से संभव हुई हैं।” कार्यक्रम के समन्वय-आधारित कार्यान्वयन पर जोर देते हुए, श्रीमती श्रीवास्तव ने कहा कि राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम अत्यधिक जोखिम वाली आबादी तक पहुंच बनाने में सहायता करता है, जबकि सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम हेपेटाइटिस बी की जन्म के समय की खुराक के साथ-साथ स्वास्थ्य कर्मियों का टीकाकरण भी प्रदान करता है। उन्होंने बताया कि मातृ स्वास्थ्य कार्यक्रम गर्भवती महिलाओं की प्रसवपूर्व जांच और हेपेटाइटिस बी पॉजिटिव माताओं के नवजात शिशुओं को एचबीआईजी (हेपेटाइटिस बी इंस्टेंट वैक्सीन) देकर मां से बच्चे में संक्रमण को रोकते हैं।
उन्होंने बताया कि इन समन्वित प्रयासों के परिणामस्वरूप 7.64 करोड़ से अधिक गर्भवती महिलाओं की जांच की जा चुकी है, जबकि हेपेटाइटिस बी पॉजिटिव माताओं से जन्मे 2.24 लाख नवजात शिशुओं को एचबीआईजी टीका लगाया गया है। उन्होंने गहन प्रयासों की आवश्यकता पर जोर देते हुए प्रत्येक संक्रमित व्यक्ति की पहचान और देखभाल से जोड़ने का आह्वान किया और रोगी ट्रैकिंग, उपचार और फॉलो-अप को मजबूत करने के लिए आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (एबीडीएम) के साथ एकीकृत एनवीएचसीपी केस-बेस्ड मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम (सीपीएमआईएस) के प्रभावी उपयोग पर बल दिया, जिससे रोग के आगे प्रसार को रोकने में मदद मिलेगी।
इस अवसर पर राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस नियंत्रण कार्यक्रम (एनएचएम) की अपर सचिव और मिशन निदेशक श्रीमती आराधना पटनायक ने बताया कि राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस नियंत्रण कार्यक्रम हेपेटाइटिस बी और हेपेटाइटिस सी पर केंद्रित है। इसके उपायों का उद्देश्य प्रसवपूर्व जांच और संक्रमित माताओं के नवजात शिशुओं को एचबीआईजी टीके लगाकर हेपेटाइटिस बी के मां से बच्चे में संक्रमण को रोकना है और हेपेटाइटिस सी का शीघ्र पता लगाना तथा उपचार सुनिश्चित करना है, विशेष रूप से उच्च जोखिम वाले समूहों, जिनमें इंजेक्शन द्वारा नशीली दवाओं का सेवन करने वाले (आईडीयू) शामिल हैं। उन्होंने कहा कि यह कार्यक्रम प्रजनन और बाल स्वास्थ्य (आरसीएच) कार्यक्रम और राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के साथ समन्वय के माध्यम से कार्यान्वित किया जा रहा है और सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को प्राप्त करने की दिशा में अपने समन्वय का विस्तार कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि कार्यक्रम के दौरान जारी की गई सूचना, शिक्षा और संवाद (आईईसी) सामग्री राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में जागरूकता और पहुंच प्रयासों को मजबूत करेगी।
स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक (डीजीएचएस) डॉ. लवनीत गोपाल कृष्ण; राष्ट्रीय वायरल हेपेटाइटिस नियंत्रण कार्यक्रम (एनवीएचसीपी) के संयुक्त सचिव, श्री निखिल गजराज; भारत में डब्ल्यूएचओ के प्रतिनिधि, डॉ. इवान जे.-एफ. हुतिन; एनवीएचसीपी
की उपायुक्त, डॉ. संध्या काबरा; अपर मुख्य सचिव (स्वास्थ्य) और मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी भी इस अवसर पर उपस्थित थे। इस कार्यक्रम में प्रधान सचिव (स्वास्थ्य), राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मिशन निदेशक, कार्यक्रम अधिकारी, विशेषज्ञ और अन्य हितधारक भी वर्चुअल माध्यम से शामिल हुए।