न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई ने प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा और उच्च पत्रकारिता मानकों को बनाए रखने की प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की दोहरी जिम्मेदारी पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता के लिए ईमानदारी, सटीकता और सही जानकारी साझा करने की प्रतिबद्धता जरूरी है, खासकर आज के दौर में जब गलत सूचना और तकनीक का दुरुपयोग बढ़ रहा है।उन्होंने उल्लेख किया कि पीसीआई ने समितियाँ और फैक्ट-फाइंडिंग टीमें बनाई हैं और पत्रकारों को जिम्मेदारी से काम करने और हर तथ्य को सत्यापित करने की याद दिलाई। उन्होंने कल्याणकारी योजनाओं और बीमा के माध्यम से पत्रकारों के लिए वित्तीय सुरक्षा के महत्व पर भी जोर दिया और कहा कि पीसीआई के इंटर्नशिप कार्यक्रम युवा पत्रकारों को नैतिक प्रथाओं को सीखने में मदद करते हैं।उन्होंने आगे कहा कि एआई उपयोगी हो सकता है, लेकिन पीसीआई इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए भी सतर्क है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ये उपकरण चाहे कितने भी उन्नत क्यों न हों, ये कभी भी मानव मस्तिष्क, निर्णय और विवेक की जगह नहीं ले सकते।
एआई युग में विश्वसनीयता बनाए रखना
पीटीआई के सीईओ श्री विजय जोशी ने कहा कि लोकतंत्र के नैतिक प्रहरी के रूप में प्रेस को दृढ़ नैतिकता बनाए रखनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि पेड न्यूज़, विज्ञापन और सनसनीखेज और अतिशयोक्तिपूर्ण पत्रकारिता ने जनता का विश्वास कम किया है। डिजिटल व्यवधान के बदलाव का एक गंभीर परिणाम यह है कि अब सटीकता की जगह जुड़ाव को अधिक प्राथमिकता दी जा रही है जिससे पक्षपातपूर्ण सूचनाओं का बुलबुला बनता है। इसने दिखाया है कि सच्चाई और गलत सूचना कितनी जल्दी एक हो सकती हैऔर आज एआई ने इस खतरे को और बढ़ा दिया है।उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि पत्रकारों को सत्य की पुष्टि सुनिश्चित करने की साझा जिम्मेदारी लेनी चाहिए। उन्होंने 99 अख़बारों द्वारा स्थापित पीटीआई की सत्यता, सटीकता, निष्पक्षता और स्वतंत्रता की विरासत पर प्रकाश डाला। उन्होंने जोर देकर कहा कि सटीकता को हमेशा गति से ऊपर रखा जाना चाहिए और समाचार किसी भी विशिष्ट उद्देश्य और एजेंडे से मुक्त होना चाहिए।फैक्ट चेक जैसी पहल बहुस्तरीय सत्यापन के साथ गलत सूचनाओं की बाढ़ से निपटने में मदद करती हैं। उन्होंने कहा कि विश्वसनीयता की रक्षा के लिए, भावी पत्रकारों को नैतिकता और आलोचनात्मक सोच का प्रशिक्षण दिया जाना आवश्यक है। श्री जोशी ने याद दिलाया कि प्रेस की स्वतंत्रता सूचना इकोसिस्टम को प्रदूषित करने का लाइसेंस नहीं है और पत्रकारिता विश्वास पर आधारित एक जन सेवा है।

भारतीय प्रेस परिषद के विषय में
भारतीय प्रेस परिषद की स्थापना संसद के एक अधिनियम द्वारा 1966 में एक अर्ध-न्यायिक प्राधिकरण के रूप में की गई थी (जिसे 1979 में पुनर्गठित किया गया था), जिसका उद्देश्य प्रिंट मीडिया के लिए एक आंतरिक स्व-नियामक तंत्र स्थापित करना था ताकि स्वतंत्र और उत्तरदायी रिपोर्टिंग सुनिश्चित हो सके। तब से, प्रेस परिषद देश में प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा और संरक्षण तथा देश में समाचार पत्रों और समाचार एजेंसियों के स्तर को ऊँचा उठाने के लिए निरंतर प्रयासरत है और इसने विधायिका और अन्य प्राधिकारियों के लिए एक सलाहकार निकाय के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।