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15 से 22 जुलाई तक, दशमहाविद्याओं के उपासना का महापर्व है गुप्त नवरात्र

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भीनमाल-(माणकमल भंडारी)नवरात्रि में माता दुर्गा के वाहन का विशेष महत्व होता है।मां दुर्गा की आराधना की शुरुआत नवरात्रि के जिस वार से शुरू होती है, उसी के आधार पर माता के वाहन का निर्धारण होता है। बुधवार से शुरुआत होने पर माता नौका पर सवार होकर आती हैं। भागवत पुराण के मुताबिक यह वाहन अच्छी वर्षा, समृद्धि और कृषि में उन्नति का प्रतीक माना जाता है।श्रीदर्शन पंचांग के प्रधान सम्पादक शास्त्री प्रवीण त्रिवेदी ने बताया कि 15 जुलाई बुधवार को घट स्थापना के साथ शुरू होने वाली नवरात्र 23 जुलाई शुक्रवार तक रहेगी। घट स्थापना 15 जुलाई को आर्द्रा पुष्य नक्षत्र एवं हर्षण एवं वज्र योग में होगा। शास्त्रों में कलश को सुख-समृद्धि, ऐश्वर्य और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना गया है। बिना कलश स्थापना के कोई भी धार्मिक अनुष्ठान पूरा नहीं माना जाता है। कलश को पांच तरह के पत्तों से सजाया जाता है और उसमें हल्दी की गांठ, सुपारी, दूर्वा, आदि रखी जाती है। कलश को स्थापित करने के लिए उसके नीचे बालू की वेदी बनाई जाती है और उसमें जौ बोये जाते हैं। कलश के मध्य में सभी मातृशक्तियां, समस्त सागर, सप्तद्वीपों सहित पृथ्वी, गायत्री, सावित्री, शांतिकारक तत्व, चारों वेद, सभी देव, आदित्य देव, विश्वदेव, सभी पितृदेव एकसाथ निवास करते हैं। कलश की पूजा मात्र से एक साथ सभी प्रसन्न होकर यज्ञ कर्म को सुचारुरूपेण संचालित करने की शक्ति प्रदान करते हैं। त्रिवेदी ने बताया कि वर्ष में चार नवरात्र आती है । जिसमें यह गुप्त नवरात्र के नौ दिन तक मां के नव रूप शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कुण्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी एवं सिद्धिदात्री की पूजा अर्चना करें। इन दिनों मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा भाव से व्रत, उपवास तथा शुद्ध उच्चारण वालें ब्राह्मण से मार्कण्डेश्वर ऋषि द्वारा रचित सप्तशती के पाठ, हवन आदि करानें से अक्षुण्ण पुण्य की प्राप्ति होती है। सप्तशती के प्रत्येक चरित्र में अलग-अलग सात महासतियों की शक्तियों को गुप्त रूप से बताया गया है। यथा लक्ष्मी, ललिता, काली, दुर्गा, गायत्री, अरून्धती एवं सरस्वती। साथ ही काली, तारा, छिन्नमस्ता, मातंगी, भुवनेश्वरी, बाला एवं कुब्जिका। तथा नन्दा शताक्षी, शाकंभरी, भीमा, रक्त दंतिका, दुर्गा व भ्रामरी।

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