राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने नईदिल्ली में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा आयोजित मानवाधिकार दिवस समारोह में उप-स्थित होकर समारोह की शोभाबढ़ाई।
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राष्ट्रपति ने कहा कि भारत में हम इस तथ्य से संतोष कर सकते हैंकि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग उनके बारे में जागरूकता फैलानेके सर्वोत्तम संभव प्रयास कर रहा है। उन्होंने कहा कि अब अपने 30वें वर्ष में, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मानवाधिकारों कीरक्षा के साथ-साथ उन्हें बढ़ावा देने का सराहनीय काम किया है।राष्ट्रपति ने कहा कि यह मानव अधिकारों के लिए विभिन्न वैश्विकमंचों में भी भाग लेता है। उन्होंने कहा कि भारत को इस बात कागर्व है कि उसके काम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया है।
राष्ट्रपति ने कहा कि संवेदनशीलता और सहानुभूति विकसितकरना मानव अधिकारों को बढ़ावा देने की कुंजी है। उन्होंने कहाकि यह अनिवार्य रूप से कल्पना शक्ति का अभ्यास है। राष्ट्रपति नेकहा कि यदि हम उन लोगों के स्थान पर स्वयं की कल्पना करसकते हैं जिन्हें मानव से कम समझा जाता है, तो यह हमारी आंखेंखोल देगा और हमें आवश्यक कार्य करने के लिए बाध्य करेगा।उन्होंने कहा कि एक तथाकथित ‘सुनहरा नियम’ है, जो कहता है, “दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा तुम चाहते हो कि वेतुम्हारे साथ व्यवहार करें” यह नियम मानवाधिकार प्रवचन कोखूबसूरती से प्रस्तुत करता है।
राष्ट्रपति ने कहा कि आज से मानवाधिकारों की सार्वभौमिकघोषणा के 75 वर्ष पूरे होने के वर्ष भर चलने वाले विश्वव्यापीसमारोह की शुरुआत हो गई है और संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2022 केविषय के रूप में ‘डिग्निटी, फ्रीडम एंड जस्टिस फॉर ऑल’ यानीगरिमा, स्वतंत्रता और सभी के लिए न्याय को चुना है। उन्होंने कहाकि दुनिया पिछले कुछ वर्षों में असामान्य मौसम पैटर्न के कारणबड़ी संख्या में प्राकृतिक आपदाओं से पीड़ित हुई है। राष्ट्रपति नेकहा कि जलवायु परिवर्तन पूरे विश्व में दस्तक दे रहा है। उन्होंनेकहा कि गरीब देशों के लोग हमारे पर्यावरण को होने वाले नुकसानकी भारी कीमत चुकाने जा रहे हैं। राष्ट्रपति ने कहा कि हमें अबन्याय के पर्यावरणीय आयाम पर विचार करना चाहिए।
राष्ट्रपति ने कहा कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती इतनी बड़ी है कियह हमें ‘अधिकारों’ को फिर से परिभाषित करने के लिए मजबूरकरती है। उन्होंने कहा कि पांच वर्ष पहले उत्तराखंड उच्चन्यायालय ने कहा था कि गंगा और यमुना नदियों के पास मनुष्य केसमान कानूनी अधिकार हैं। राष्ट्रपति ने कहा कि भारत अनगिनतपवित्र नदियों, झीलों और पहाड़ों के साथ पवित्र भूगोल की भूमिहै। उन्होंने कहा कि इन परिस्थितियों में, वनस्पति और जीव समृद्धजैव विविधता को जोड़ते हैं। राष्ट्रपति ने कहा कि पुराने समय में, हमारे संतों और महात्माओं ने उन सभी को हमारे साथ-साथ एकसार्वभौमिक संपूर्ण विश्व के हिस्से के रूप में देखा। इसलिए, जिसतरह मानवाधिकारों की अवधारणा हमें हर इंसान को अपने सेअलग नहीं मानने के लिए प्रेरित करती है, उसी तरह हमें पूरीजीवंत दुनिया और उसके परिवेश का सम्मान करना चाहिए।
राष्ट्रपति ने कहा कि उन्हें आश्चर्य है कि हमारे आस-पास के जीव-जंतु और पेड़ अगर बोल सकने में सक्षम होते तो वे हमें क्या बताते, हमारी नदियां मानव इतिहास के बारे में क्या कहतीं और हमारेमवेशी मानव अधिकारों के विषय पर क्या कहते। उन्होंने कहा किहमने लंबे समय तक उनके अधिकारों को कुचला है और अबपरिणाम हमारे सामने हैं। उन्होंने कहा कि हमें सीखना चाहिए, बल्कि फिर से यह सीखने की आवश्यक्ता है कि प्रकृति के साथसम्मान के साथ व्यवहार करना चाहिये। राष्ट्रपति ने कहा कि यह नकेवल एक नैतिक कर्तव्य है बल्कि यह हमारे अपने अस्तित्व केलिए भी आवश्यक है।
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